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1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं

To-whom-does-Kashmir-belong-Pakistan-or-Indiaभारत के चहुंओर चुनौतियां हैं, जमीनी ही नहीं कूटनीतिक भी। कितने प्रयास किए, कितनी सुहानुभूति बटोरी दुनिया की नजर में, फिर भी ऐसे कालचक्र में फंसा है हिंदुस्तान कि निकलना महज़ सवाल ही है। किसी को नहीं पता कब सुधरेंगे रिश्ते। कब शांत होंगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं। डालते हैं नजर, एक वह कहानी जो शुरू तो हमारे यहां से ही हुर्इ पर खत्म नहीं …. कहां चूके, क्या हैं कमियां, क्या मिल रहे हैं संकेत, जानिए अभी……..

Vijayram @ EDITORIAL
बीसवीं सदी जहां ‘इंडिया’ के गणतंत्र बनने के लिए इतिहास में दर्ज हुर्इ, वहीं खंडित हो अपने ही हिस्से द्वारा हमें चोट पहुंचाते रहने का माहौल भी बना गर्इ। आजादी के समय से ही दोनों देशों (हिंदुस्तान और पाकिस्तान) में तनातनी का दौर चल पड़ा। कर्इ युद्घ हुए, जिनमें 100-100 से अधिक सैनिकों की जानें गर्इं। इसके अलावा आए रोज सरहद पर गोलीबारी का दंश भी झेलना पड़ रहा है।

यह आग कब शांत होगी, किसी को नहीं पता। दोनों देशों के अपने निहितार्थ हैं, लेकिन एक जहां शांति और भार्इचारे के प्रयास से कभी पीछे नहीं छूटा तो दूसरे से जवाब में गोले और आतंक के सूर ही मिले। न यह बात हमारी राजनीति के समझ आ रही है, न ही पाकिस्तान में फौजी शासन के, कि ”नफरत” हमेशा बरबाद ही करती है, कुछ हासिल नहीं होता। कब समझेंगे हम कि शांति और भाइचारा अपनी जगह है, गुनाहों पर दंड देने में ढीलनीति क्यों हो?

1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं.. और कब सुधरेगा पाकिस्तान, ये जानते हुए भी कि कश्मीर उसका नहीं, भारत का अभिन्न अंग है। राजा हरिसिंह ने हिंदुस्तान में उसका अधिकारिक रूप से विलय कराया था। क्या इससे पहले नेहरू ने अंदर नहीं झांका, कि आने वाली पीढियों पर धारा 370 का दंश हमेशा पड़ता रहेगा। क्या तब भारतीय कूटनीति पाकिस्तान की कु-नीति से कमजोर थी, जो आज 128 जनसंख्या और दुनिया में सातवां सबसे बड़ा मुल्क होने के बावजूद उससे ‘हैट’ खा रहे हैं।

आधा कश्मीर ही क्यों है भारत में?
जम्मू & कश्मीर का पूरा क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किमी है। यूएन में भी कश्मीर भारतीय स्टेट के रूप में दर्ज है, लेकिन पूरा नहीं। तो आधा कहां हैं, कब छिना हमसे? 1947 में आजादी मिलते ही पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर की उत्तरी सीमा पर हमला बोल दिया था। हिमालय की ऊंची-चोटियां भी उन्होंने कब्जा लीं, जबकि उस वक्त हिंदुस्तान में वजीरे-आजम नेहरू थे। विभाजन के बाद जहां, 66 टैंक, 4लाख बंदूकें, तीन सौ नगर (रियासत भी शामिल) हमारे हिस्से आर्इं वहीं उससे एक तिहार्इ पाकिस्तान के हिस्से। इतिहास में दर्ज है पढ लेना, कि बारिश से बचने के लिए पाकिस्तानी हकूमत के पास त्रिपाल तक नहीं थी। हिंदुस्तान ने 75 करोड़ करोड रूपए दिए,तब जाकर पाकिस्तान का नाम चढा़। देख लेना, बाकायदा गदर फिल्म में भी इसका जिक्र किया गया है।

तो इस अक्षमता के बावजूद पाकिस्तान ने आधा कश्मीर हडप कैसे लिया, क्या नहीं ज्यादा था तब भी हमारे पास उनसे। जो माकूल जवाब नहीं दे पाए। जब गिलगित, मुजफ्फराबासहित 80 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पाकिस्तान में चली गर्इ। तो, ध्यान दीजिए आज मीडिया में ब्रिटेन के फोटोग्राफरों के हवाले से नेहरू की शाही आदतों के फोटो वायरल होते हैं? क्यों, कहीं हमारी जमीन पाक द्वारा हड़पने के वक्त चिलम-सिगार ही तो नहीं लगा रहे थे नेहरू? अंग्रेजिन राजकुमारी के साथ ! वो माचिस जला रही होती और सिगार हमारे प्रथम प्रधानमंत्री के मुंह में चलती” आजकल सोशल साइट्स पर कर्इ सारे फोटो हैं, वे नकली नहीं हैं। अधिकारिक हैं (जो भारतीय तोशाखाने में भी मिल जाएंगे)। तो इस तरह 1947-48 के दौरान ही 80 हजार वर्ग किमी भूमि यूं ही चली गर्इ हमारी, उसके बाद सन् 62 में चीन ने बिना घोषणा के धावा बोल दिया।

लंबे चली इस एकतरफा जीत में हमारी 38,000 वर्ग किमी भूमि दाब ली गर्इ, नेहरू फिर खाली हाथ रह गए। वही पुरानी नीति, भाईचारा जवाब दे गया। भूमि कब्जाने के बाद चीन ने युद्घ विराम की घोषणा कर दी। आज-कल जब हम तुम किताबों में, इंटरनेट पर भारत-चीन युद्घ के बारे में पढ़ते हैं तो पूरी कहानी मिलती ही नहीं है। न हमारे शहीद जवानों के नाम सामने आते हैं और न ही यह पता चलता है कि किस तरह लड़ार्इ लडीं। हां, ”भारत बुरी तरह हारा” ये हेडलाइन विदेशी मीडिया में पूरी कवरेज के साथ दिखार्इ गयीं। इस हार के जिम्मेदार कौन थे, तो नेहरू से जुड़ी कहानी लीक होती रहती हैं। ऑस्ट्रेलियन राइटर ने यह दावा किया था, भारतीय राजनीति में भी ”नेहरू हार के जिम्मेदार” विषय पर चर्चा हो चुकी है।

1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहींआज ऐसे हैं कश्मीरी भू-भाग के आंकडे़
जम्मू-कश्मीर डॉट कॉम पर प्रदेश के तीन हिस्से बताए गए हैं। आधे से अधिक कश्मीर पर पाकिस्तान और चीन का कब्जा है। हां मानचित्र में इसकी नस हमारे हाथों है, लेकिन विकिपीडिया केवल भारत में कश्मीर को हमारे हवाले दिखाता है। आप पाकिस्तान पहुंचकर विकीपीडिया का कश्मीर पेज ओपन करना, कहां है कश्मीर। कुल 2,22,236 वर्ग किमी क्षेत्रफल में से सिर्फ 75,092 वर्ग मील भूमि ही भारत में आती है। जबकि इसका शेष भाग चीन व पाकिस्तान के कब्जे में है।

पाकिस्तान ने 78,114 वर्ग किमी + 6,000 वर्ग किमी कश्मीर हड़प लिया था, जिसमें से 5,180 वर्ग किमी का टुकडा़ 1965 में चीन को सौंप दिया। वहीं 1962 के युद्घ में चीन ने करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। यानी कश्मीर का केवल 45% हिस्सा ही हमारे पास बाकी रह गया है। जिस पर भी पाक प्रयोजित आतंकवाद, पाक मिलट्री द्वारा गोलीबारी और लद्दाख में चीनी घुसपैठ से हमें जूझना पड़ रहा है।

कश्मीर के किनारे, रौब गोलियों के सहारे
दुनिया में कोर्इ सरहद सर्दियों में भी गर्म है तो वो है भारत-पाक बॉर्डर, शायद ही कोर्इ ऐसा सप्ताह निकला हो जब दोनों के बीच झड़प न हुर्इ हो। सरहद पार कोर्इ न कोर्इ छेडखानी होती ही रही है। जिसका जवाब हमारे जवान देते जरूर हैं, लेकिन भारतीय कूटनीति दुनिया को यह बताने में नाकामयाब रही है कि पाकिस्तान को रोकने में कोर-कसर नहीं है। हमारा पीओके को वापिस भारत में शामिल करना तो दूर, शेष कश्मीर के लिए भी पाक परस्त ताकतें सक्रिय हो रही हैं। कश्मीर के किनारे – किनारे ठों-ठुस्स की गूंज सुनार्इ देती हैं। तो अंदर अलगावादियों के नापाक मंसूबे चलते हैं।

जितनी पाकिस्तान की पूरी फौज, उससे अधिक तो हमारी कश्मीर में है
यह सच है कि पाकिस्तान हमारे आगे कहीं नहीं ठहरता। चाहे क्षेत्रफल हो, जनसंख्या हो, आर्थिक रफ्तार हो, सेना हो या हथियार हों। फिर भी हमारे जवानों की गर्दन काटने जैसी हरकतें बीते India–Pakistan border skirmishesसालों में हुर्इं। सीजफायर के मामले राजग सरकार की शुरूआत में थमे, फिर वहीं ढपली राग शुरू हो गए। ग्लोबलफायरपावर डॉट कॉम के मुताबिक पाकिस्तान में मिलट्री की संख्या 6,50,000 है, जबकि उससे कहीं अधिक 7,00,000 पैरा मिलट्री फोर्स भारत की कश्मीर में तैनात है। इनके अलावा 12,00,000 रिजर्व एक्टिव आर्मी (दुनिया में सर्वाधिक) भी भारत में है। यानी इतना कुछ होते हुए भी देश की अखंडता बनाए रखना चुनौती है तो, बिना सरहद पर सेना तैनात किए क्या हालात होते? अंदाजा लगाना ही मुश्किल होता।

वेपंस के साथ चलती है जुबानी जंग
सीमा पर हथियारों से टकराव के साथ ही हिंदुस्तान-पाकिस्तान में किसी न किसी मुद्दे पर जुबानी तकरार होती ही रहती है। दोनों ओर के राजनेता, अपनी – अपनी हांकते हैं। पाकिस्तान में कोर्इ (बिलावल) पूरे कश्मीर को हडपने की बात करता है तो, भारत में उन्हें जवाब देने की। लेकिन जुबानी जंग से सार्थक परिणाम निकल कुछ नहीं रहा है। हाल ही आतंक के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच चीन कूद पड़ा, लखवी और हाफिज पर भारत को ठेंगा मिला। सरक्रीक विवाद, सुरक्षा परिषद में सदस्यता और अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में भी दोनों देश लंबे समय से विरुद्घ हैं।

क्या कभी शांत होंगी सरहदें
हिंदुस्तान में नर्इ सत्ता आते ही पक्ष की बडी़-बडी़ बातें सुनने को मिलती हैं। जबकि विपक्ष पुरानी जडें कुरेदने लगता है। लेकिन यह बस जुबानी सचार्इ है कि कश्मीर को पाकिस्तान को सौंद दिया जाए तो हस्तक्षेप बंद हो जाएंगे। ऐसा कभी नहीं होगा, विश्व पटल पर परमाणु ताकतों के रूप में उभर चुकी दो धुरी अमेरिका-कनाडा़ बॉर्डर जैसी शांति और स्थिरता बटोर सकें। बीते 68 साल में हमने-आपने हकीकत देखी है, क्या कुछ सार्थक पहल नहीं की गर्इं। लेकिन इसे भारतीय फौज की नाकामी समझा जाता है कि न तो सरहद पर हमले रोक सके और न ही देश में होने वाले आतंकी हमले। पंचांगों में समय आने से पहले ही बता दिया जाता है कि आर्इ साल पाक से संबंध सुधरने की कोशिशें बेकार जाएंगी। और फिर होता भी यही है। बिना घोषित युद्घों (सीजफायर-गोलीबारी) में भी हमने हजारों सैनिक पाक से रोजाना की झड़पों में खो दिए हैं।

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