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तुलसी को हुआ था गणेश से प्यार, शादी से मना करने पर दे दिया ये श्राप

Two Popular Stories About Ganesha》जीवन दर्शन Desk: किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान श्रीगणेश का पूजन किया जाता है। ये परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। भगवान श्रीगणेश का जन्म कैसे हुआ और उनका मस्तक के स्थान पर किस प्रकार हाथी का मस्तक जोड़ा गया आदि बहुत सी बातें आमजन जानते हैं, लेकिन श्रीगणेश के बारे में कुछ बातें ऐसी भी हैं जो बहुत से लोग नहीं जानते हैं।

Vijayrampatrika.com गणेशोत्सव के शुभ अवसर पर आपको भगवान श्रीगणेश की कुछ ऐसी ही अनजानी व रोचक बातें बता रहा है। ये बातें इस प्रकार हैं-

1- तुलसी ने दिया था श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थी, उस समय वहां श्रीगणेश तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए, लेकिन श्रीगणेश ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

2- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुण्यक नाम व्रत किया था, इसी व्रत के फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण पुत्र रूप में माता पार्वती को प्राप्त हुए। क्लिक कर पढें.. श्री कृष्ण के अवतार हैं गजानन, पूरा रोचक प्रसंग।

3- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश के शरीर का रंग लाल और हरा है। श्रीगणेश को जो दूर्वा चढ़ाई जाती है वह जडऱहित, बारह अंगुल लंबी और तीन गांठों वाली होना चाहिए। ऐसी 101 या 121 दूर्वा से श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।

4- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश का विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से हुआ है। श्रीगणेश के दो पुत्र हैं इनके नाम क्षेत्र तथा लाभ हैं। भगवान श्रीगणेश से जुड़ी अन्य रोचक बातें जानने के लिए छुएं यहां दिए गए फोटोज और अंदर पढें स्लाइड्स में…

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ऐसे चढ़ाएं भगवान श्रीगणेश को पेड़ों के पत्ते, हर मनोकामना पूरी होगी

ganesh_chaturthi_pooja》जीवन दर्शन Desk: भगवान गणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार विभिन्न पेड़-पौधों व पत्तों से भी भगवान की पूजा करने का विधान है। उसी के अनुसार यदि भगवान गणेश को विभिन्न प्रकार के पत्ते विधि-विधान से अर्पित किए जाएं तो हर चिंता दूर हो जाती है। उसी के अनुसार सबसे पहले भगवान गणेश को शमीपत्र चढ़ाकर ‘सुमुखाय नम:’ कहें।

इसके बाद क्रम से यह पत्ते चढ़ाएं और नाम मंत्र बोलें –

1. बिल्वपत्र ‘उमापुत्राय नम:’
2. दूर्वादल ‘गजमुखाय नम:’
3. बेर ‘लम्बोदराय नम:’
4. धतूरे का पत्ता ‘हरसूनवे नम:’
भगवान श्री गणेश से जुडी़ पूजा-परंपराएं5. सेम का पत्ता ‘वक्रतुण्डाय नम:’
6. तेजपत्ता ‘चतुर्होत्रे नम:’
7. कनेर का पत्ता ‘विकटाय नम:’
8. आक का पत्ता ‘विनायकाय नम:’
9. अर्जुन का पत्ता ‘कपिलाय नम:’
10. मरुआ का पत्ता ‘भालचन्द्राय नम:’
11. अगस्त्य का पत्ता ‘सर्वेश्वराय नम:’
12. वनभंटा ‘एकदन्ताय नम:’
13. भंगरैया का पत्ता ‘गणाधीशाय नम:’
14. अपामार्ग का पत्ता ‘गुहाग्रजाय नम:’
15. देवदारु का पत्ता ‘वटवे नम:’
16. गान्धारी पत्र ‘सुराग्रजाय नम:’
17. सिंदूर या सिंदूर वृक्ष का पत्ता ‘हेरम्बाय नम:’
18. केतकी पत्र चढ़ाकर ‘सिद्धिविनायकाय नम:’
19. कदली या केला ‘हेमतुंडाय नम:’

अंत में दो दूर्वादल गन्ध, फूल और चावल गणेशजी को चढ़ाना चाहिए।

5 सितंबर, सोमवार को गणेश चतुर्थी है। इस शुभ अवसर पर Vijayrampatrika.com आपको भगवान श्री गणेश से जुडी़ पूजा-परंपराओं और उनके जन्म से जुडी़ रोचक कथाओं से अवगत करा रहा है। इस लिंक पर क्लिक करके आप अपनी जिज्ञासा पूर्ण कर सकते हैं… lord Ganesh Spcl.

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इस खास दिन श्री गणेश की उपासना कर सकते हैं आप, साल के हर माह में

GOD GANESH, Worship Tips by Vijayrampatrika.comपार्वती नन्दन गणेश बुद्धिदाता देवता माने जाते हैं। हिन्दू धर्म पंचांग के हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर श्रीगणेश उपासना का विशेष महत्व है। यह शुभ घड़ी संकट चतुर्थी के रूप में खासतौर पर श्रीगणेश के सिद्धिविनायक रूप की भक्ति से बुद्धि और विवेक की वृद्धि व समृद्ध करने वाली भी मानी गई है।
विवेक यानी सही या गलत का फर्क करने की समझ, इसके बिना शरीर या दौलत की ताकत भी बेकार हो सकती है। किंतु जीवन के सही फैसलों में बुद्धि और विवेक ही अहम भूमिका होती है, जिससे कामयाबी की राह आसान हो जाती है। संकट चतुर्थी (सितंबर) पर सिद्धिविनायक की उपासना ऐसे ही काम और कामना की सिद्धि की दृष्टि से बहुत अहम है। इसके लिए बड़ा ही आसान व अचूक उपाय शास्त्रों में उजागर है, जो पृष्ठ पर बताया गया है –

संकट चतुर्थी या गणेश उपासना के किसी भी दिन गणेशजी की पूजा में खासतौर पर भगवान श्रीगणेश को प्रिय दूर्वा यानी दूब चढ़ाने का महत्व है। दूर्वा अर्पण से हर विघ्न, बाधा और कष्टों का अंत माना जाता है। जानिए सिद्धिविनायक पूजा में दूर्वा चढ़ाने का विशेष मंत्र –
» सुबह स्नान कर घर के देवालय या श्रीगणेश मंदिर में श्रीसिद्धिविनायक गणेश की पूजा करें।
» पूर्व दिशा में मुख कर भगवान गणेश की मूर्ति की पंचोपचार यानी कुंकुम, अक्षत यानी चावल, फूल के अलावा इस विशेष मंत्र के साथ दूर्वा अगले भाग की ओर से समर्पित करें। दूर्वा की संख्या विषम 3, 5 या 7 रखना शुभ होता है। किस मंत्र से चढ़ाएं दूर्वा, यह भी जानिए :

दुर्वा अर्पण मंत्र –
दुर्वा करान्सह रितान मृतन्मंगल प्रदान।
आनी तांस्तव पूजार्थ गृहाण परमेश्वर।।

– इसके बाद भोग में मोदक यानी लड्डुओं का भोग लगाएं। सिंदूर की प्रतिमा होने पर सिंदूर चढ़ाएं और श्रीगणेश के चरणों का सिंदूर मस्तक पर लगाएं।
» ऐसी पूजा और दूर्वा का अर्पण हर बुधवार, हर माह की दोनों चतुर्थी या हर रोज स्नान के बाद पीले कपड़े पहन करना सारे विघ्नों का नाश कर अपार यश, सुख व सफलता देने वाला माना गया है।

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ये हैं गणपति के गण और आपके लिए मंत्र, संवरते रहे तो यूं हर दिन होगा आज !

GOD GANESH, Worship Tips by Vijayrampatrika.com गण ऐसे हुए अवतरित »
लोगों में आज गणेशजी की सेवा-अराधना के साथ ही फलप्राप्ति की जाग्रति रहती है, इसके पीछे कारण है एक बार देवों के गुरू ब्रहस्पति कार्यसिद्घ के लिए बुलाए गये। मंत्रादि में वे ही प्रयुक्त हुए। इसके अलावा और भी रूप गणेश जी के प्रकृट हुए जिनसे स्मरण करने वाले को शीघ्र ही लाभ मिलता। हर कार्य की सिद्धि के लिए बृहस्पतिदेव के प्रतीकात्मक रूप में गणेशजी पूजनीय हैं। सतयुग में कश्यप ऋषि पुत्र के रूप में वह विनायक हुए और सिंह पर सवार होकर देवातंक -निरांतक का वध किया। त्रेता में मयूरेश्वर के रूप में वह अवतरित हुए।
इतना ही नहीं धर्म शास्त्रों में 21 गणों का उल्लेख है, जिनमें गजास्य, विघ्नराज, लंबोदर, शिवात्मज, वक्रतुंड, शूर्पकर्ण, कुब्ज, विनायक, विघ्ननाश, वामन, विकट, सर्वदैवत, सर्वाॢतनाशी, विघ्नहर्ता, ध्रूमक, सर्वदेवाधिदेव, एकदंत, कृष्णपिंड्:ग, भालचंद्र, गणेश्वर और गणप शामिल हैं। इन इक्कीसों के कारण बाबा गणेश की पूजा के भी इक्कीस ही विधान किए जाते हैं।

कार्य सिद्घ करने वाले महामंत्र
ऋग्वेद में गणेश जी की महिमा वर्णित है, जिसमें इच्छाप्राप्ति के भी उपाय बताए गए हैं। एक मंत्र तो चाहे कोई सा अनुष्ठान हो, सब में जपा जाता है…गणनां त्वा गणति हवामहे…।

देवगुरू ब्रहस्पति भी इसमें आमंत्रित होते हैं, चूंकि बृहस्पति देव बुद्धि और ज्ञान के देव हैं। इसलिए गणपति देव को भी बुद्धि और विवेक का देव माना गया है। किसी भी कार्य की सिद्धि बिना बुद्धि और विवेक के नहीं हो सकती। आप देखें ऋग्वेद (2-23-1) से यह बृहस्पति देव के लिए प्रयुक्त हुआ है। दूसरा मंत्र भी बेहद प्रभावी माना गया है, इसे वह भक्त ज्यादा मानते हैं जिन्हें अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है।

पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप किया जाता है इसके लिए। फिर आंखें बंद करके अपना सवाल पूछते हैं और श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली यंत्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक देते हैं। जिस कोष्ठक पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने प्रश्न का उत्तर समझा जाता है।

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गणेश जी के वाहन कैसे बने मूषकराज, देखिए पुराणों में छिपा राज!

Ganesha and Lord Parshuram storyबुढापे में स्तुति करते लोग हों या स्कूल में प्रार्थना करते हुए बच्चे, सबके मन में गणपति का स्मरण जरूर हो आता है। लेकिन श्री गणेश अकेले ही भोग का हिस्सा नहीं होते, साथ में मूषक का मुंह भी चिंया का हिस्सेदार होता है। ऐसे में कभी आपको ख्याल आया होगा कि कैसे वह (चूहा) उनके साथ पूजनीय हैं? गणेशजी ने अपना वाहन मूषक क्यों चुना? यहां बताया जा रहा है पूरा प्रसंग । जिसमें भक्तों की जिज्ञासा का हल हो वह न केवल शास्त्र हैं, बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही किवदंतियां भी हैं।

कहा जाता है कि गजमुखासुर नामक एक असुर से गजानन का युद्ध हुआ। गजमुखासुर को यह वरदान प्राप्त था कि वह किसी अस्त्र से नहीं मर सकता। गणेश जी ने इसे मारने के लिए अपने एक दांत को तोड़ा और गजमुखासुर पर वार किया। गजमुखासुर इससे घबरा गया और मूषक बनकर भागने लगा। गणेश जी ने मूषक बने गजमुखासुर को अपने पाश में बांध लिया। गजमुखासुर गणेश जी से क्षमा मांगने लगा। गणेश जी ने गजमुखासुर को अपना सफल योगदान देने के प्रक्षेप्य में जीवनदान दे दिया। कहते हैं कि तब से गजमुखासुर वाहन बनकर गनपति की सेवा करने लगे।

गांवों में बुजुर्गों की टोली अक्सर प्राचीन काल के ग्रंथों पर चर्चा करती रहती हैं, इस दौरान भगवान के इंसानी अवतारों और दुष्टों के संहार पर भी बातें होती हैं। एक ने बताया कि गणेश जी के भार वाहक का किस्सा है, गणेश पुराण में। जिसके अनुसार द्वापर युग में एक बहुत ही बलवान मूषक महर्षि पराशर के आश्रम में आकर महर्षि को परेशान करने लगा। उत्पाती मूषक ने महर्षि के आश्रम के मिट्टी के बर्तन तोड़ दिये। आश्रम में रखे अनाज को नष्ट कर दिया। ऋषियों के वस्त्र और ग्रंथों को कुतर डाला। प्रभु को अर्पित किए जाने वाले फल खा लिए।

तब महर्षि पराशर ने भगवान गणेश का आवाह्न किया। दैत्य रूपी मूषक की करतूतों के बारे में बताया, जिससे महर्षि पराशर सहित अन्य ऋषि-चेले भी काफी दुः खी थे। शिवनन्दन गणेश जी ने देखा कि ये दैत्य रूपी मूषक ऐसे ही और कई जगह उत्पात मचा चुका है, शीघ्र ही अपना पास उसको बांधने के लिए छोडा़। यह देख वह मूषक भागने लगा। उसका पीछा करते हुए पाश भी पाताल लोक पहुंच गया। वहां से उसे बांधकर गणेश जी के सामने ले आया। खुद को वहां पाकर मूषक यानि चूहे का दिमांग एकदम परिवर्तित हो गया और गणेश जी को सामने देखकर उनकी स्तुति करने लगा।

पूरी कथा पढने के लिए गैलरी छुएं। दिए गए पिक्स पर क्लिक कर अंदर जानें और कौन हैं गणेश जी के वाहन, चूहे के बाद किसे पूजें आप…

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