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दशानन होते भी यूं हार गया रावण, जानिए श्रीराम की विजय से जुडा़ 1 रोचक FACT

Shri Ramहर वर्ष आने वाला विजयादशमी पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि की नौ रातों में शक्ति पूजा द्वारा शक्ति संचय की भाव के साथ विजयादशमी पर श्रीराम का स्मरण किया जाता है और बुराई और अहंकार के प्रतीक रावण का दहन किया जाता है।

राम-रावण युद्ध से जुड़ी यह मान्यता प्रचलित है कि भगवान राम ने रावण का वध कर अहंकार के अंत से ही तमाम सुख को पाने की राह दिखाई। किंतु राम और रावण के चरित्र और व्यक्तित्व को व्यावहारिक नजरिए से तुलना कर विचार करें तो रावण का अहंकार ही नहीं बल्कि उसके चरित्र की एक ओर बड़ी खामी दुर्गति का कारण बनी। यह दोष अगर किसी भी इंसान के चरित्र में मौजूद हो तो उसका हर गुण, योग्यता, क्षमता निरर्थक होकर असफल और दु:खी जीवन का कारण बन सकती है। इसे भगवान राम के 1 सिर व रावण के 10 सिरों पर गौर कर सोचें तो बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। अब जानिए श्रीराम व रावण से जुड़ा एक रोचक पहलू –

दरअसल, अक्सर रावण के दस सिर चरित्र दोषों के प्रतीक माने जाते हैं। किंतु रावण के चरित्र का सकारात्मक पक्ष यह भी था कि वह वेद, शास्त्रों, अनेक कलाओं व विद्याओं के साथ ज्योतिष व कालगणना का ज्ञाता था। लिहाजा राम व रावण के व्यक्तित्व व चरित्र से जुड़ा एक दर्शन यह भी माना जाता है कि अगर राम बुद्धि संपन्न थे, तो रावण, राम से दस गुना बुद्धिमान था। बावजूद इसके वह राम के सामने परास्त हुआ। ऐसा इसलिए कि बुद्धि व ज्ञान संपन्नता के बावजूद रावण विवेक हीन था। जबकि सिर्फ एक सिर वाले राम बुद्धि के साथ विवेकवान भी थे यानी, सही और गलत, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच फर्क  करने की अद्भुत क्षमता भगवान राम के पास थी, किंतु रावण के पास अभाव।

दूसरे शब्दों में समझें तो राम का 1 सिर संकल्प का प्रतीक तो रावण को विकल्पों की उलझन का प्रतीक है। बस, राम की यही खूबी जीत का और रावण की खामी हार का कारण बनी।  इस प्रसंग में सार यही है बुद्धि के साथ वक्त, हालात के मुताबिक सही और गलत को चुनने की सही निर्णय क्षमता भी सफल और सुखी जीवन के लिए अहम होती है। अन्यथा रावण की भांति दंभ, विकल्पों से भरा और विवेकहीन स्वभाव व व्यवहार जीवन में कुंठा, निराशा और असफलता लाता है।

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