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बेहद लय में दिलकश कविताएं | चुड़ैल | Geet·tarang

》Geet tarang Desk : हरिहर झा@Vijayrampatrika.com
————————————-»For you, this minor Editor's Blog. published by labor and Humane. Extremely Famous in Hindi.

नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली
खुश हूँ अपने आप में
अपने काम से काम
मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता
यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं
क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?
हार गई वह बेचारी
मेरा दुखी मन सहला-सहला कर
कितना मुश्किल है यह सब !

पर न उठी मेरे मन के गलियारे में
खुशियां और किलकारियां
तो सुना डाली उसने मुझे वह
टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी
खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान
चाहती तो बचा कर रख सकती थी
अपने पति को
जिसके पैरों की आहट थी
सौगात मेरे लिये
पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये
भेजे ई-मेल
दिखा डाले उसने
अपने हनिमून पर लिये फोटो
कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी
वह भी जानती है
उन फोटो में उसकी जगह पर
मैं हो सकती थी
पर अंगड़ाई ली समय ने
मैं पत्थर-दिल
सह गई सब कुछ
कब उठे और
कब अर्पित हुये भाग्य को
मेरे विद्रोह
एहसास भी न हुआ किसी छोर पर
पर अब मैं अनाप-शनाप
कुछ भी सोंचती हूँ
कि चुड़ैल है वह  !

पगला गई हूँ
नहीं जान पाती
कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह
या जलायेगी मुझे
कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में
भला क्यों छिड़केगी
जले पर नमक  ?
पर मैं हूँ कि कतराती हूँ
आँख चुराती हूँ उससे
अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

— by Harihar Jha (hariharjhahindi.wordpress.com)
Tags: अशिष्ट, चुड़ैल, जले पर नमक, हरिहर झा।
》Geet tarang Desk: In this section you have see a collection of beautiful poems, pls singing and dive intovowels. And more Worth reading materials at: Www.vijayrampatrika.wordpress.com

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1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं

To-whom-does-Kashmir-belong-Pakistan-or-Indiaभारत के चहुंओर चुनौतियां हैं, जमीनी ही नहीं कूटनीतिक भी। कितने प्रयास किए, कितनी सुहानुभूति बटोरी दुनिया की नजर में, फिर भी ऐसे कालचक्र में फंसा है हिंदुस्तान कि निकलना महज़ सवाल ही है। किसी को नहीं पता कब सुधरेंगे रिश्ते। कब शांत होंगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं। डालते हैं नजर, एक वह कहानी जो शुरू तो हमारे यहां से ही हुर्इ पर खत्म नहीं …. कहां चूके, क्या हैं कमियां, क्या मिल रहे हैं संकेत, जानिए अभी……..

Vijayram @ EDITORIAL
बीसवीं सदी जहां ‘इंडिया’ के गणतंत्र बनने के लिए इतिहास में दर्ज हुर्इ, वहीं खंडित हो अपने ही हिस्से द्वारा हमें चोट पहुंचाते रहने का माहौल भी बना गर्इ। आजादी के समय से ही दोनों देशों (हिंदुस्तान और पाकिस्तान) में तनातनी का दौर चल पड़ा। कर्इ युद्घ हुए, जिनमें 100-100 से अधिक सैनिकों की जानें गर्इं। इसके अलावा आए रोज सरहद पर गोलीबारी का दंश भी झेलना पड़ रहा है।

यह आग कब शांत होगी, किसी को नहीं पता। दोनों देशों के अपने निहितार्थ हैं, लेकिन एक जहां शांति और भार्इचारे के प्रयास से कभी पीछे नहीं छूटा तो दूसरे से जवाब में गोले और आतंक के सूर ही मिले। न यह बात हमारी राजनीति के समझ आ रही है, न ही पाकिस्तान में फौजी शासन के, कि ”नफरत” हमेशा बरबाद ही करती है, कुछ हासिल नहीं होता। कब समझेंगे हम कि शांति और भाइचारा अपनी जगह है, गुनाहों पर दंड देने में ढीलनीति क्यों हो?

1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहीं.. और कब सुधरेगा पाकिस्तान, ये जानते हुए भी कि कश्मीर उसका नहीं, भारत का अभिन्न अंग है। राजा हरिसिंह ने हिंदुस्तान में उसका अधिकारिक रूप से विलय कराया था। क्या इससे पहले नेहरू ने अंदर नहीं झांका, कि आने वाली पीढियों पर धारा 370 का दंश हमेशा पड़ता रहेगा। क्या तब भारतीय कूटनीति पाकिस्तान की कु-नीति से कमजोर थी, जो आज 128 जनसंख्या और दुनिया में सातवां सबसे बड़ा मुल्क होने के बावजूद उससे ‘हैट’ खा रहे हैं।

आधा कश्मीर ही क्यों है भारत में?
जम्मू & कश्मीर का पूरा क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किमी है। यूएन में भी कश्मीर भारतीय स्टेट के रूप में दर्ज है, लेकिन पूरा नहीं। तो आधा कहां हैं, कब छिना हमसे? 1947 में आजादी मिलते ही पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर की उत्तरी सीमा पर हमला बोल दिया था। हिमालय की ऊंची-चोटियां भी उन्होंने कब्जा लीं, जबकि उस वक्त हिंदुस्तान में वजीरे-आजम नेहरू थे। विभाजन के बाद जहां, 66 टैंक, 4लाख बंदूकें, तीन सौ नगर (रियासत भी शामिल) हमारे हिस्से आर्इं वहीं उससे एक तिहार्इ पाकिस्तान के हिस्से। इतिहास में दर्ज है पढ लेना, कि बारिश से बचने के लिए पाकिस्तानी हकूमत के पास त्रिपाल तक नहीं थी। हिंदुस्तान ने 75 करोड़ करोड रूपए दिए,तब जाकर पाकिस्तान का नाम चढा़। देख लेना, बाकायदा गदर फिल्म में भी इसका जिक्र किया गया है।

तो इस अक्षमता के बावजूद पाकिस्तान ने आधा कश्मीर हडप कैसे लिया, क्या नहीं ज्यादा था तब भी हमारे पास उनसे। जो माकूल जवाब नहीं दे पाए। जब गिलगित, मुजफ्फराबासहित 80 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पाकिस्तान में चली गर्इ। तो, ध्यान दीजिए आज मीडिया में ब्रिटेन के फोटोग्राफरों के हवाले से नेहरू की शाही आदतों के फोटो वायरल होते हैं? क्यों, कहीं हमारी जमीन पाक द्वारा हड़पने के वक्त चिलम-सिगार ही तो नहीं लगा रहे थे नेहरू? अंग्रेजिन राजकुमारी के साथ ! वो माचिस जला रही होती और सिगार हमारे प्रथम प्रधानमंत्री के मुंह में चलती” आजकल सोशल साइट्स पर कर्इ सारे फोटो हैं, वे नकली नहीं हैं। अधिकारिक हैं (जो भारतीय तोशाखाने में भी मिल जाएंगे)। तो इस तरह 1947-48 के दौरान ही 80 हजार वर्ग किमी भूमि यूं ही चली गर्इ हमारी, उसके बाद सन् 62 में चीन ने बिना घोषणा के धावा बोल दिया।

लंबे चली इस एकतरफा जीत में हमारी 38,000 वर्ग किमी भूमि दाब ली गर्इ, नेहरू फिर खाली हाथ रह गए। वही पुरानी नीति, भाईचारा जवाब दे गया। भूमि कब्जाने के बाद चीन ने युद्घ विराम की घोषणा कर दी। आज-कल जब हम तुम किताबों में, इंटरनेट पर भारत-चीन युद्घ के बारे में पढ़ते हैं तो पूरी कहानी मिलती ही नहीं है। न हमारे शहीद जवानों के नाम सामने आते हैं और न ही यह पता चलता है कि किस तरह लड़ार्इ लडीं। हां, ”भारत बुरी तरह हारा” ये हेडलाइन विदेशी मीडिया में पूरी कवरेज के साथ दिखार्इ गयीं। इस हार के जिम्मेदार कौन थे, तो नेहरू से जुड़ी कहानी लीक होती रहती हैं। ऑस्ट्रेलियन राइटर ने यह दावा किया था, भारतीय राजनीति में भी ”नेहरू हार के जिम्मेदार” विषय पर चर्चा हो चुकी है।

1948, 1971 फिर कारगिल, कब शांत होगी सरहद, जवाब किसी के पास नहींआज ऐसे हैं कश्मीरी भू-भाग के आंकडे़
जम्मू-कश्मीर डॉट कॉम पर प्रदेश के तीन हिस्से बताए गए हैं। आधे से अधिक कश्मीर पर पाकिस्तान और चीन का कब्जा है। हां मानचित्र में इसकी नस हमारे हाथों है, लेकिन विकिपीडिया केवल भारत में कश्मीर को हमारे हवाले दिखाता है। आप पाकिस्तान पहुंचकर विकीपीडिया का कश्मीर पेज ओपन करना, कहां है कश्मीर। कुल 2,22,236 वर्ग किमी क्षेत्रफल में से सिर्फ 75,092 वर्ग मील भूमि ही भारत में आती है। जबकि इसका शेष भाग चीन व पाकिस्तान के कब्जे में है।

पाकिस्तान ने 78,114 वर्ग किमी + 6,000 वर्ग किमी कश्मीर हड़प लिया था, जिसमें से 5,180 वर्ग किमी का टुकडा़ 1965 में चीन को सौंप दिया। वहीं 1962 के युद्घ में चीन ने करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। यानी कश्मीर का केवल 45% हिस्सा ही हमारे पास बाकी रह गया है। जिस पर भी पाक प्रयोजित आतंकवाद, पाक मिलट्री द्वारा गोलीबारी और लद्दाख में चीनी घुसपैठ से हमें जूझना पड़ रहा है।

कश्मीर के किनारे, रौब गोलियों के सहारे
दुनिया में कोर्इ सरहद सर्दियों में भी गर्म है तो वो है भारत-पाक बॉर्डर, शायद ही कोर्इ ऐसा सप्ताह निकला हो जब दोनों के बीच झड़प न हुर्इ हो। सरहद पार कोर्इ न कोर्इ छेडखानी होती ही रही है। जिसका जवाब हमारे जवान देते जरूर हैं, लेकिन भारतीय कूटनीति दुनिया को यह बताने में नाकामयाब रही है कि पाकिस्तान को रोकने में कोर-कसर नहीं है। हमारा पीओके को वापिस भारत में शामिल करना तो दूर, शेष कश्मीर के लिए भी पाक परस्त ताकतें सक्रिय हो रही हैं। कश्मीर के किनारे – किनारे ठों-ठुस्स की गूंज सुनार्इ देती हैं। तो अंदर अलगावादियों के नापाक मंसूबे चलते हैं।

जितनी पाकिस्तान की पूरी फौज, उससे अधिक तो हमारी कश्मीर में है
यह सच है कि पाकिस्तान हमारे आगे कहीं नहीं ठहरता। चाहे क्षेत्रफल हो, जनसंख्या हो, आर्थिक रफ्तार हो, सेना हो या हथियार हों। फिर भी हमारे जवानों की गर्दन काटने जैसी हरकतें बीते India–Pakistan border skirmishesसालों में हुर्इं। सीजफायर के मामले राजग सरकार की शुरूआत में थमे, फिर वहीं ढपली राग शुरू हो गए। ग्लोबलफायरपावर डॉट कॉम के मुताबिक पाकिस्तान में मिलट्री की संख्या 6,50,000 है, जबकि उससे कहीं अधिक 7,00,000 पैरा मिलट्री फोर्स भारत की कश्मीर में तैनात है। इनके अलावा 12,00,000 रिजर्व एक्टिव आर्मी (दुनिया में सर्वाधिक) भी भारत में है। यानी इतना कुछ होते हुए भी देश की अखंडता बनाए रखना चुनौती है तो, बिना सरहद पर सेना तैनात किए क्या हालात होते? अंदाजा लगाना ही मुश्किल होता।

वेपंस के साथ चलती है जुबानी जंग
सीमा पर हथियारों से टकराव के साथ ही हिंदुस्तान-पाकिस्तान में किसी न किसी मुद्दे पर जुबानी तकरार होती ही रहती है। दोनों ओर के राजनेता, अपनी – अपनी हांकते हैं। पाकिस्तान में कोर्इ (बिलावल) पूरे कश्मीर को हडपने की बात करता है तो, भारत में उन्हें जवाब देने की। लेकिन जुबानी जंग से सार्थक परिणाम निकल कुछ नहीं रहा है। हाल ही आतंक के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच चीन कूद पड़ा, लखवी और हाफिज पर भारत को ठेंगा मिला। सरक्रीक विवाद, सुरक्षा परिषद में सदस्यता और अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में भी दोनों देश लंबे समय से विरुद्घ हैं।

क्या कभी शांत होंगी सरहदें
हिंदुस्तान में नर्इ सत्ता आते ही पक्ष की बडी़-बडी़ बातें सुनने को मिलती हैं। जबकि विपक्ष पुरानी जडें कुरेदने लगता है। लेकिन यह बस जुबानी सचार्इ है कि कश्मीर को पाकिस्तान को सौंद दिया जाए तो हस्तक्षेप बंद हो जाएंगे। ऐसा कभी नहीं होगा, विश्व पटल पर परमाणु ताकतों के रूप में उभर चुकी दो धुरी अमेरिका-कनाडा़ बॉर्डर जैसी शांति और स्थिरता बटोर सकें। बीते 68 साल में हमने-आपने हकीकत देखी है, क्या कुछ सार्थक पहल नहीं की गर्इं। लेकिन इसे भारतीय फौज की नाकामी समझा जाता है कि न तो सरहद पर हमले रोक सके और न ही देश में होने वाले आतंकी हमले। पंचांगों में समय आने से पहले ही बता दिया जाता है कि आर्इ साल पाक से संबंध सुधरने की कोशिशें बेकार जाएंगी। और फिर होता भी यही है। बिना घोषित युद्घों (सीजफायर-गोलीबारी) में भी हमने हजारों सैनिक पाक से रोजाना की झड़पों में खो दिए हैं।

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INVESTIGATIONS: दंगे होते किसके कसूर से हैं, देखें दो सबसे बडी़ घटना

क्यों होते हैं दंगे, किसका है कसूर, इस एक घटना से यूं समझेंआजाद पारेख | हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जिसे दुनिया में शांति, आस्था और भाइचारे की जन्मभूमि माना गया है। यहां हर महजब के लोग हैं और सबके लिए सबसे ज्यादा देवालय भी। यहां सबसे ज्यादा भाषा हैं, बोलिया हैं और भिन्न-भिन्न रहन-सहन भी। फिर वजह क्या है ऐसे हिचकोलों की, क्यों होते हैं दंगे, क्यों लोग इंसानियत की सिर्फ करते हैं, क्या निर्दोष पशुओं को मारकर खाना उन लोगों की अभिन्न प्रकृति है…. देखें सभी पहलू और जानें एक नजर में……

सबसे पहले एक वह घटना,
जिसने केवल हिंदुस्तान की धर्मनिरपेक्षता पर चोट पहुंचार्इ, बल्कि ”सनातन” की साख पर नफरत के अंगारे भी फोड़े। कथित ‘धर्म’ के ठेकेदारों ने बच्चे पैदा करने, गायों को मारने, दूसरे महजबिए पर काबिज होने, संस्कृति और संस्कारों को भ्रांति बताने और हिंसा के जरिए ”जन्नत” दिलाने सुर जन-गणों में भरा :

शुरुआत गुजरात से
हिंदुस्तान में विदेशी ताकतों के आने व निकलने तक बंबर्इ में गिना जाने वाली रियासत, उससे पहले अपने पौराणिक महत्व के कारण जानी जाती रही। यहां 5,000 बरस पूर्व तक के अवशेष (द्वारिका) मिल चुके हैं। लगभग 9 सौ बरस पूर्व भारत में अपने आगमन के साथ ही, इस्लाम ने यहां भी अपने पैर जमाए। इसके बाद आजाद गणतंत्र बनने तक लोगों की कर्इ ‘वराइटी’ हो गर्इं। खासतौर पर जब 90 का दशक अाया, गुजरात में वराइटी के बीच चिंगारियां शुरू हो गर्इं। इक्कीस वीं सदी आते ही सांप्रदायिकता का विकराल माहौल बना। नर्इ सदी में सवा साल भी प्रवेश नहीं कर पाए, दंगे शब्द ने जन्म ले लिया। हालांकि फसाद तो पहले भी हुए, लोग मरे भी बहुत थे। लेकिन दुनिया में कहानी इन घटनाओं से भारत के नाम फैली। गोधरा नरसंहार हुआ, लेकिन ‘दो हाथ बिन ताली’ ये कहावत तो झूंट है नहीं। लिहाजा जो मिला, दुष्परिणाम। इस दौरान हुर्इ सैकडों मौंतें, आगे चलकर हजारों तक पहुंच गर्इं।

गोधरा की कडी़
अंग्रेजों से आजादी मिलने के साथ ही हिंदुस्तान ने दो दंश झेले, काश ऐसा होता ही न ! महजब के आधार पर कथित जनप्रतिनितिधियों ने देश के टुकडे कराने में अंग्रेजों के साथ प्लानिंग की। एक प्योर मुस्लिम राष्ट्र बना और दूसरा वह जिसमें सभी शामिल थे। 14 अगस्त को पाकिस्तान के उत्थान की घोषणा के साथ ही लाहौर, कराची, सिंध आदि हिस्सों से हिंदुओं का हिंदुस्तान पलायन होने लगा। दूसरे पाकिस्तान (बांग्लादेश) से भी ऐसी जान लील-भगदड़ मची, प्रतिक्रिया हिंदुस्तान में भी दी गर्इ। कितने मरे, कितनी महिला और बच्चियां उन कट्टरपंथियों के हत्थे चढीं, बुजुर्गों से सुन सकते हैं, लेकिन आंकडे किसी के पास नहीं हैं। गोधरा पाकिस्तान के नजदीक था, इसलिए वहां उसके जैसी वराइटी का ‘जोर’ जमा हो गया। पहली बार मीडिया रिपोर्ट तब बनी, जब 1980 में गोधरा रेलवे यार्ड के पास 2 बच्चों सहित 5 हिंदुओं के कत्लेआम से कोहराम मच गया। 1990 में दो महिलाओं सहित 4 हिंदु शिक्षकों के मदरसे में मारे जाने की घटना छपी। Muslim militants have more role in riots or tensions - yes and no? . do you vot here... Www.vijayrampatrika.com

फिर नरसंहार कांड
अयोध्या में रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद वाली आग की तपिश पूरे देश में महसूस की गर्इ। 2002 में नफरत की स्याह रातें तब आर्इं जब, लखनऊ से साबरमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से 4 घंटे देरी से गोधरा पहुंची। 27 फरवरी के दिन सुबह करीब पौने 8 बजे एक्सप्रेस जैसे ही प्लेटफार्म छोड़कर आगे बढी़, कि जंजीर खिंच गर्इ। कुछ लोगों ने तत्काल एस-6 और एस-7 डिब्बे के बीच का जोड़ काट दिया। बोगियां बाहर से बंद कर दी गर्इं, जिनमें अधिकतर अयोध्या से लौट रहे कारसेवक बैठे थे। यह सब ऐसा योजनानुसार जानलेवा षडयंत्र था, जिससे इन बोगियों में सवार लोगों का बचना नामुमकिन रहा। धर्मांन्ध भीड ने बोगियां आग के हवाले कर दीं। जो कुछ एस-7 से बाहर निकले, वे भी बचने में असमर्थ रहे।

पुलिस के पहुंचने तक मौत नंगी नाचती रही। बहुत मशक्कत के पश्चात् हमलावर खदेडे गए, लेकिन करीब 3 घंटे बाद दंगार्इयों की भीड़ ने पुलिस व पूजा कर लौटे तीर्थयात्रियों को पुन: घेर लिया। इस दौरान पुलिस ने 7 सिपाहियों के घायल होने की पुष्टि की। वहीं 2 दंगार्इ पुलिस द्वारा मार गिराए गए। मौके पर 59 कारसेवकों के शव बरामद किए गए, जिनमें 15 बच्चे और 25 औरतें शामिल थीं। मृतकों के शरीर पर तेज धारदार हथियार चाकू, छुरियां और बंदूकों से प्रहार किए गए। इस भयानक हत्याकांड के बाद ”सेक्युलरिज्म” का बुरका पहने कुछ संगठनों व दलों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हद तो तब हो गर्इ जब, इस्लामी उग्रवादियों ने इसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की उचित प्रतिक्रिया बताते हुए जायज ठहराने की कोशिश की। इस नीच-कृत्य का परिणाम यह हुआ कि पूरे गुजरात में दंगों की आग सुलग गर्इ। इस दौरान करीब 2 हजार जानें गर्इं। जिनमें किस महजब से कितने मरे, इसे लेकर सेक्युलरजादों ने खूब हो-हल्ला मचाया।

मोदी के पाले पड़ा नरसंहार
इन दंगों के समय गुजरात में नरेंद्र भार्इ मोदी की सरकार थी। जनप्रतिनिधि होने का दायित्व होने के कारण नरसंहार का दंश मोदी के पाले पड़ गया। जबकि राज्य सरकार का दावेनुसार, इस तरह की घटनाएं रोकने की भरपूर कोशिश की गर्इ। खुद मुख्यमंंत्री ने घटनास्थलों पर पहुंच हालात काबू किए जाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उनके सुरक्षा सलाहकारों ने उग्रवादियों से संभावित हमले का खतरा भांपकर उन्हें सरकारी विमान की इजाजत नहीं दी। हालांकि इन सबके बावजूद निजी वाहन के जरिए वे मृतकों व पीडितों तक पहुंचे। मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जहां (दंगों में मारे गए कांग्रेस सांसद की पत्नी) जाफरी ने दंगों की कालिख मोदी पर पोती। राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि जिस दिन गुजरात दंगों की भेंट चढा़, बजट पेश किया जा रहा था। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों की बेकाबू भीड़ के चलते ‘शूटआउट’ का सहारा लेना पड़ा। जिसके बाद स्थिति नियंत्रण में आ सकी।

संगठनों ने की अगुवार्इ !
सांप्रदायिक मारकाट में पुलिस व जांच एजेंसियों को कुछ उग्रवादी संगठनों की भूमिका हाथ लगी। गुजरात के सुरक्षाबलों ने इन्वेस्टिगेशन जारी कर, दंगों की आग इस्लामिक गुटों द्वारा भडकाए जाने की बात कही। दंगों में मोहम्मद कलोटा, हाजी बिलाल, ”जमीअत-उलमा-इ-हिंद” आदि द्वारा उकसाने की भूमिका सामने आर्इ। कोर्ट में सभी पक्षों ने अपनी-अपने हथकंडे अपनाए। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेर्इ ने जहां गुजरात सरकार को ‘राजधर्म’ निभाने की नसीहत दी। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस और मीडिया संगठनों ने भाजपा सरकार को आडे़ हाथों लिया, हालांकि कर्इ साल बाद सामने आर्इ एसआर्इटी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी की कथित भूमिका का कोर्इ साक्ष्य नहीं मिला। दंगों की जांच को अदालत द्वारा गठित कमेटी ने 2011 में 11 फांसी व 20 को उम्रकैद की सजा सुनार्इ। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के मुख्यमंत्री पर लगे आरोपों को हटाते हुए उन्हें क्लीनचिट दे दी।

गोधरा बनाम 1984 के दंगे
गुजरात दंगों से पूर्व पंजाब में 1984 में हुआ नरसंहार भी भारतीय इतिहास की बडी़ शर्मनाक घटना है। इसकी क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 5,000 से अधिक लोगों के कत्लेआम की विभीषका सामने आर्इ। दंगों का दंश लगातार तीन दिन तक चला, इस दौरान कांग्रेस उत्तराधिकारी राजीव गांधी पर उंगलियां उठीं। मीडिया में उनके हवाले से दंगे को जायज ठहराने की बात तब सामने आर्इ, जब उन्होंने कहा, – जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है।” इन दंगों में बडी़ तादाद में सिख मारे गए। यद्यपि गुजरात दंगे मामले में मोदी पर लगे सारे आरोप कोर्ट ने निरस्त कर दिए, लेकिन कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी (राजीव गांधी की पत्नी) ने उन्हें ”मौत का सौदागर” तक कहा। इसके बावजूद गुजरात में फिर भाजपा की सरकार बनी। मोदी को कोर्ट द्वारा निर्दोष साबित किए जाने के बाद भी विरोधियों द्वारा घेरे जाने पर कुछ हिंदुवादियों ने ‘बद अच्छा बदनाम बुरा’ कहावत को दोहराया। आज भी दोनों दंगे के आरोपियों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

यूपी में सबसे ज्यादा दंगे
देश के सबसे बडे़ राज्य उत्तर प्रदेश में दंगे-फसाद की दंश सबसे ज्यादा है। यहां हर साल छोटे-बडे सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगे में राज्य सरकार पर खूब उंगली उठीं। लेकिन बावजूद पीडितों की मदद करने के, घटनास्पद जिले में डांस कार्यक्रम आयोजित किए गए। यूपी में लखनऊ, मुजफ्फरनगर, मथुरा, मेरठ, अलीगढ़ आदि क्षेत्र दंगों के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं। इंसानों के साथ ही इनमें बडे़ पैमाने पर जानवरों (गाय, बकरे,ऊंट) का कत्लेआम देखा गया है।

दंगे कैसे होते हैं
हिंदुस्तान में अब महजबों के आधार पर ढेर सारे सांप्रदायिक गुट बन गए हैं। कुछ राजनीति के जरिए लोगों को ब्रेनवॉश करते हैं, तो कुछ अल्पसंख्यक कार्ड के जरिए। जब कहीं कोर्इ घटना होती है, तो उस क्षेत्र से संबंधित उग्रवादी दल बजाए शांत कराने के उसे हवा देते हैं। कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में ऐसे सक्रिय संगठनों की संख्या अधिक है। कश्मीर तो आए दिन हिंसा की आग में जलने को मजबूर है। वहींं सोशल मीडिया पर विभिन्न मंचों द्वारा उकसाने की गतिविधियां चलती रहती हैं। कर्इ इस्लामिक उग्रवादी गुटों (आतंकियों) पर देश में बैन भी लगाया जा चुका है।

Source: Wikipedia.org, bbc.com/ 120223_gujarat_case_status, Wikipedia.org/wiki/1984_anti-Sikh_riots and more.

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जानिए क्या है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, क्यों हो रहा है इसका विरोध?

 Land Acquisition Bill❥ राजग सरकार पीछे हटने को नहीं तैयार, विपक्ष विरोध तो अन्ना आंदोलन पर आतुर
❥ जानिए क्या है लैंड बिल का सच, क्यों हो रहा विरोध?
❥ क्या है भूमि अधिग्रहण विधेयक?
Vijayrampatrika.com | Land Acquisition Bill: main points of debate & controversy
केंद्र सरकार ग्रामीण आधारभूत संरचना, देश की सुरक्षा, रक्षा, औद्योगिक कॉरिडोर और पीपीपी सहित अन्य सार्वजनिक सेवाओं के लिए जमीन लेती है, बदले में किसान को मुआवजा, पुनर्स्थापना भत्ता, ग्रामीण क्षेत्र में 150 वर्ग मीटर और शहरी क्षेत्रों में 50 वर्गमीटर ज़मीन पर बना बनाया मकान देने का वादा करती है। भूमि कब्जाने का काम (कानून) सरकार द्वारा संसद में राज्यसभा व लोकसभा, दोनों सदनों में बिल पास कराने के बाद ही मंजूर होता है। यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश कहलाता है।
साल 2013 से पहले तक भूमि अधिग्रहण काम मुख्यतः 1894 में बने कानून के तहत होता था। यह जबरन जमीन लिए जाने की स्थिति को रोकने में मददगार था, लेकिन 2013 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने संसद में भूमि अध्रिग्रहण बिल पास किया। जिसमें नर्इ नीतियां बनार्इ गर्इं, कर्इ फैसले किसानों के हित में लिए गए। पिछले साल 2014 में मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आर्इ राजग सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया, जिसमें 2013 की कर्इ नीतियां संशोधित कर नए तरीके से लार्इ गर्इं। जो (विपक्ष के अनुसार) किसानों के हितों को प्रभावित करने वाली हैं। इस माह मोदी land acquisition act ordinance | Vijayrampatrika.com सरकार संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को पास कराने में जुटी है, लेकिन कथित रूप से किसानों को झकझोर देने वाले निर्णयों पर विपक्ष कतर्इं सहमत नहीं है। दूसरे, समाजसेवी अन्ना हजारे भी इस बिल के विरोध में जंतर-मंतर पहुंच गए हैं। लोकसभा में भारी बहुमत के चलते सरकार ने हाल ही अध्यादेश को लोकसभा में पेश किया, लेकिन आगे राह राज्यसभा में पेश करने के दौरान आसान नहीं है। चूंकि राज्यसभा में बहुमत संप्रग धडे़ के पास ही है।

पिछले साल बदला जा सकता था, लेकिन अब?
वर्ष 1894 में देश में पहली बार भूमि अधिग्रहण बिल आया था। यह कानून अंग्रेज सरकार द्वारा बनाया था, जो जाहिर तौर पर किसानों के लिए बेहद निराशाजनक और शोषणकारी था। यह कानून 120 बरसों बाद 2014 में बदला जा सकता था। अपने कार्यकाल के दौरान संप्रग सरकार ने इसमें कर्इ सुधार भी किए। लेकिन अब राजग सरकार इस विधेयक में संशोधन करने जा रही है। लेकिन किसानों को राहत नहीं देने के सवाल पर अन्ना हजारे व विपक्षी दल विरोध में हैं। उनके अनुसार, मोदी सरकार का यह बिल किसानों के हित में ही नहीं है।

भूमि अधिग्रहण पर संप्रग और राजग सरकार के कानून की तुलना
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर… यह थीं संप्रग सरकार की नीति
– 2013 में कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने जो बिल पास किया उसके अनुसार, किसी गांव की जमीन अधिग्रहित करनी है तो गांव के 70% किसानों की सहमति होना जरूरी था।
– सरकार द्वारा अधिग्रहित भूमि पर यदि 5 साल में डेवलपमेंट नहीं हुआ तो वह भूमि फिर से किसानों को वापिस मिलने का प्रावधान किया गया।
– अधिग्रहण सिर्फ बंजर भूमि का ही कर सकते थे, सिंचार्इ हेतु उपयोग भूमि का नहीं। साथ ही अधिग्रहित भूमि के बदले किसानों को पुनर्व्यवस्था का भी प्रबंध किया गया।
Hindi Articles_land acquisition, Rehabilitation and Resettlement act – संप्रग सरकार द्वारा पारित मसौदे में अधिग्रहण के कारण जीविका खोने वाले लोगों को 12 महीने के लिए प्रति परिवार 3,000 रुपए प्रति माह जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का भी प्रावधान था।

– पुनर्स्थापना भत्ते के तौर पर 50,000 रुपए का प्रावधान किया गया था।
– ग्रामीण क्षेत्र में 150 वर्ग मीटर और शहरी क्षेत्रों में 50 वर्गमीटर ज़मीन पर बना बनाया मकान सरकार भूमि अधिग्रहण का शिकार हुए को देगी।
– यदि किसी जमीन के अधिग्रहण को कागजो़ं पर 5 साल हो गए हैं, सरकार के पास जमीन का कब्जा नहीं है और न ही अधिग्रहण के शिकार किसान को मुआवजा़ दिया गया है तो वह कोर्ट जाकर जमीन को वापस मांग सकता है।

यह हैं राजग सरकार की नीतियां
– प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्इ सरकार द्वारा संशोधित किए गए बिल को किसानों के हित में बताया है। साथ ही कहा है कि यह हर हाल में पास होगा। विपक्ष इसे ‘जबरन भूमि अधिग्रहण बिल’ बताते हुए विरोध में खड़ा है। पास होने या न होने का फैसला संसद सत्र के दौरान सामने आ पाएगा …
– सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहित करने की घोषणा के बाद उस पर कोर्इ काम शुरू हो या न हो,जमीन सरकारी ही हो जाएगी। किसान को भूमि वापसी का कोर्इ प्रावधान नहीं किया गया है।

– नए कानून (धारा 10 ए ) के मुताबिक किसानों की सहमति हो ये जरूरी नहीं, बस यह बिल पास हो जाए।
– भूमि उपजाऊ हो या सिंचित, सरकार को यदि वह लेनी है तो कोर्इ रोक नहीं सकता। जबकि इससे पहले संप्रग सरकार के दौरान, उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण नहीं कर सकते थे।
– भूमि अधिग्रहित होने के बाद पीडि़त कोर्ट नहीं जा पाएगा। सरकार उसे सहमत करने के लिए मुआवजे संबंधी कर्इ सुविधाएं दे सकती है।
Hindi Articles_land acquisition, Rehabilitation and Resettlement act – भूमि लौटाने की सीमा पांच साल से बढ़ाकर परियोजना के बनने में लगने वाले समय तक कर दी गई है।

विरोध में सारे गैर भाजपार्इ दल, समाजसेवी अन्ना एवं किसान का तबका!
विपक्ष मोदी सरकार के संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में है। यानी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा), शिवसेना, समाजवादी पार्टी (सपा), आमआदमी पार्टी (आप), जनता दल यूनार्इटेड (जदयू), राजद और एनसीपी के अलावा वे दल जो राजग सरकार का हिस्सा नहीं हैं।

विपक्ष द्वारा विरोध की वजह
विपक्ष द्वारा किसानों के हित से सरकार के खेलने का आरोप। गैर राजग दल कह रहे हैं कि मोदी जबरन किसानों की भूमि अधिग्रहित करना चाहते हैं। जिसका फायदा निश्चित तौर पर देश के कुछ बडे़ उद्योगपतियों को ही होगा। जब गरीबों के जमीन नहीं रहेगी तो वह जीएगा कैसे? जब उपजाऊ भूमि नहीं रहेगी तो अनाज का संकट उत्पन्न हो जाएगा।

 Land Acquisition Billबिल का विरोध जायज, हम नक्सलियों की भी मदद ले सकते हैं: अन्ना
– विपक्षी तो संसद में हंगामा करेंगे। वॉकआउट कर सकते हैं। राज्यसभा में सरकार की राह के कांटे बन सकते हैं। लेकिन अन्ना हजारे..
संप्रग सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ने के बाद अब राजग सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ अभियान में जुटे हैं। बिल पर अन्ना का कहना है कि विपक्ष का विरोध सही है, बिल किसानों के हित में नहीं है। यदि सरकार ने अन्याय किया तो वे नक्सलियों की भी मदद ले सकते हैं। अन्ना ने चेतावनी दी कि वे चार महीने बाद रामलीला मैदान से ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करेंगे।

अन्ना के मुताबिक :
– नौ महीने पूर्व सत्ता में आर्इ राजग सरकार का यह भूमि अधिग्रहण बिल अलोकतांत्रिक है।
-सरकार का लैंड बिल किसान विरोधी है।
-उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार किसानों से धोखा कैसे कर सकती है?
-सरकार उसी तरह जमीन लेने की तैयारी में है, जैसे अंग्रेज करते थे।
-मेरे लिए देश की सेवा करते हुए मरना हार्ट अटैक से मौत से बेहतर है।
-ऑर्डिनेंस लाने की जरूरत क्या है, जब एक्ट 2013 में पास हो चुका है।
-बहुत कम ही किसानों को बिल की जानकारी है, जागरूकता फैलानी होगी।

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मांझी को नहीं मिली बेल, भाजपा भी हुर्इ फेल, यह था नीतीश का दावा

Hindi news_bihar political news : CM Manjhi losers, Nitish Kumar wonPolitical news » End of Domination struggle in Bihar
पटना. बिहार की सत्तासीन पार्टी जनता दल यूनार्इटेड (जदयू ) से बागी होते मांझी को पार्टी आलाकमान ने किनारे कर दिया, जिसके बाद से जदयू दो खेमे में बंट गया। एक पक्ष नीतीश कुमार सहित जदयू के बाकी नेताओं का तो दूसरा मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी समर्थित विधायकों और भाजपा का। मांझी के भाजपा के निकट जाने वाले बयानों से आहत जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, केसी त्यागी और राजद नेताओं ने मांझी को पार्टी से निष्काषित कर दिया। लेकिन मंत्रिमंण्डल और अपने समर्थकों की बदौलत मांझी बिहार की सरकार में मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे। नीतीश खेमे का जब यह लगा कि जब पार्टी ही उनके साथ नहीं है तो सरकार कैसे चला सकते हैं। इसलिए उन्होंने मांझी से इस्तीफा दिए जाने की मांग की। खुद का बहुमत दर्शाने की खातिर नीतीश 130 विधायकों के साथ दिल्ली में राष्ट्रपति के समक्ष पहुंचे। लेकिन यहां भी मांझी के कान पर जूं नहीं रेंगी। जदयू नेता राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी से मिले और लगातार संपर्क किया। दवाब बनता देख मांझी ने राज्यपाल से कहा कि उन्हें 19 फरवरी तक का समय दिया जाए, वह बहुमत साबित कर देंगे। इस बीच दोनों ओर से विधायकों की खरीद-फरोख्त होती रही। आज शुक्रवार को वह दिन आ गया जब मांझी को विधानसभा में बहुमत साबित करना था। लेकिन वे ऐसा करने से पहले ही इस्तीफा देने को राजी हो Analysis of the politics of Biharगए। नीतीश खेमे ने मांझी के इस फैसले को उनकी असफलता करार दिया वहीं मांझी ने इसे जदयू द्वारा दवाब बनाना बताया। मांझी को बेल न मिलने पर भाजपा भी अपनी उन उम्मीदों पर असफल रही, जिनमें चुनाव तक नीतीश खेमे को सत्ता से दूर रखा जा सकता था।

सरकार में पुनर्वापसी चाहते थे नीतीश
पहले मांझी को अपना उत्तराधिकारी करार देकर खुद मुख्यमंत्री पद से हटे नीतीश कुमार तब इस बात से अंजान थे कि सत्ता की सुहानुभूति का असर उनसे ही विवाद का कारण बन सकता है। बिहार में अपनी राजनैतिक धुरी मजबूत करने में जुटे मांझी ने उनके विरोधी नरेंद्र मोदी की तारीफ करनी शुरू कर दी। जो नीतीश खेमे को रास नहीं आर्इ। लिहाजा मांझी को हटाकर पुनः नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलें शुरू हो गर्इं। नीतीश का मानना था कि मांझी के विरोधी रवैये के कारण पार्टी कमजोर हो जाएगी। इसका फायदा बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को होगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। मांझी ने बागी तेवर अपनाने शुरू कर दिए। जिसके चलते नीतीश की पुनर्वापसी निश्वित हो गर्इ। मांझी विधायक दल के नेता पद से तो हटे ही, पार्टी से भी निकाल दिए गए। अब मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पडा़।

मांझी के समर्थन में आर्इ भाजपा, फायदा नहीं मिला
नीतीश कुमार के विरुद्घ मांझी की बयानों से भाजपा उनके निकट आने लगी। जानकारों की राय में, बिहार भाजपा को जदयू के खिलाफ एक चेहरे की तलाश थी जो उन्हें मांझी में नजर आया। लिहाजा इन्हीं आशंकाओं के चलते जदयू आलाकमान ने मांझी को किनारे कर दिया। इसके बाद मांझी प्रधानमंत्री मोदी के करीब और बिहार भाजपा मांझी के करीब आए। लेकिन साथ ही भाजपा को यह डर भी सता रहा था कि मांझी बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे। इसलिए वे खुलकर भी समर्थन में नहीं आए। आंकडों में जदयू 110 विधायकों के साथ बिहार की सबसे बडी़ पार्टी है जबकि भाजपा के पास मात्र 97 विधायक ही हैं। राजद के 24 सहित कुछ अन्य विधायकों को भी नीतीश खेमा अपने पक्ष लाने में कामयाब रहा। आखिरकार भाजपा अपने प्लान में फेल हो गर्इ।

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