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India is an agricultural country. About seventy percent of our population depends on agriculture. One-third of our National income comes from agriculture. Our economy is based on agriculture. The development of agriculture has much to do with the economic welfare of our country. so we’re can read’s this section.

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देखिए बडे काम के ये साधारण पौधे: इनके नियमित सेवन से मिलती है भरपूर ताकत

cynodon dactylon benefits #cynodon dactylon in hindi #cynodon dactylon homeopathic medicine #cynodon dactylon description #Factsheet - Cynodon dactylon var. dactylon. pls visit here.. 》AGRO PATRIKA Desk: प्राचीनभारत में ऋषि – मुनि प्रकृति द्वारा प्रदान चीजों से ही बलिष्ठ और नीरोग रहा करते थे। जंगल और पहाडों की तलहटी में मौजूद वनस्पतियों न केवल पेट भरने के काम आती थीं, बल्कि एक से खतरनाक एक रोग भी उनसे दूर हो जाता था। आज भी, आपके आसपास ऐसी तमाम वनस्पति (घास-फूंस) मौजूद हैं, जिन्हें अगर यूज किया जाए तो शाकाहार के साथ-साथ नेचुरल ट्रीटमेंट के विकल्प तलाशे जा सकते हैं।

Vijayrampatrika.com यहां समय-समय पर उपयोगी पेड़-पौधों के बारे में बताता रहा है। जिन्हें आम आदमी मेथॉड्स सहित आसानी से यूज कर सकता है। कुछ वनस्पति खारे पानी को मीठा बनाने में कारगर हैं तो कर्इ से 70-80 परेशानियां खत्म की जा सकती हैं। इसी कडी़ में आज आप जानेंगे जमीन पर उगने वाली घास की एक खास प्रजाति के बारे में, जिसके सेवन से सूखापन दूर किया जा सकता है, पूजा-पद्घति भी संपन्न की जाती हैं……..

दूब घास/ Cynodon dactylon Plant
घास। यानी वो पौधा जिसकी रोटियां हिंदु महा राजा राणा प्रताप ने खार्इ थीं। इसी की ‘केनडोन डैक्टेयलॅान’ किस्म उत्तर भारत के मैदानी भागों में खूब पार्इ जाती है। खेत ही नहीं शायद आपके घर के आसपास भी उग रही होगी। घास वैसे तो हजारों तरह की होती है, लेकिन इस वनस्पति को भारतीय क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से पहचाना जाता है। हिंदी में इसे दूब, दूबड़ा तो संस्कृत में दुर्वा, सहस्त्रवीर्य, अनंत, भार्गवी, शतपर्वा, शतवल्ली कहते हैं।

कहां-क्या हैं इसके नाम
महाराष्ट्र के भी कुछ हिस्सों में यह खूब पार्इ जाती है, वहां इसे पाढरी दूर्वा या काली दूर्वा के नाम से जाना जाता है। गुजराती में धोलाध्रो, नीलाध्रो तो इंग्लिश में कोचग्रास, क्रिपिंग साइनोडन भी कहते हैं। बंगाली लोग इसे नील दुर्वा, सादा दुर्वा आदि नामों से पहचानते हैं। इस प्रकार शायद ही कोर्इ ऐसा किसान हो, जो इस वनस्पति को नहीं जानता हो। गाय, भैंस, घोडी़, मृग आदि शाकाहारी पशु तो इसके लिए तुरियाते हैं। इसे चाव से खाने में अलग ही स्वाद आता है।

इस घास के फायदे
ब्रजभूमि के 72 वर्षीय बुजुर्ग रामशरन यादव, प्राकृतिक औषधियों के पुराने जानकार हैं। उन्होंने बताया कि गणेश पूजन में दूर्वा का उपयोग तो सभी करते हैं, लेकिन कम ही लोग खाने के तौर पर जानते होंगे। गुजरात में इसके बिना आध्यात्मिक अनुष्ठान संपन्न नहीं होते, दूब (dūrvā grass) प्रत्येक पूजा-पद्घति में अनिवार्य है। मानव में त्रिदोष को हरने वाली यही ताे एक औषधि है। वात कफ, पित्त सरीखे विकार इसके सेवन से दूर रहते हैं।

दिए गए फोटोज़ पर क्लिक करें और अंदर स्लाइड्स में पढें दुर्वाग्रास के महत्व, इसके उपयोग के तरीके….

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देखिए बडे काम के साधारण पौधे, आपने नहीं किया होगा इनका USE

देखिए बडे काम के ये साधारण पौधे : आप नहीं जानते होंगे USE, मीठा पानी कराने वाला भी है इनमें से एक》AGRO PATRIKA Desk: प्रकृति ने इतनी सुविधाएं हमें सौंपी हैं कि ज्यादातर लोग तो इनको यूज करना भी नहीं जानते। हो न हो आपके घर के पास उग सकने वाली घास भी कम काम की नहीं होती और गांवों, खेतों में तो मेंड-नालियों पर एक से बढकर बढिया पेड़-पौधे ऐसे मिल जाएंगे जिन्हें हम दैनिक प्रयोग में ले सकते हैं।

आपने देखा ही होगा एकाद बार कि बंसुरी नामक छोटा सा पेड़ जिसे भैंस-गाय जैसे पशु भी बडे़ चाव से खाते हैं, से इंसान कुओं और नदियों का खारा पानी इसकी पत्तियां खाकर स्वादिष्ट बना सकता है। आप चौंकिए नहीं जनाब, ऐसे ही पौधे लगभर हर प्रांत में पाए जाते हैं। खेत, मैदानी भागों, सड़क के किनारे और जंगलों में प्रचुरता से पाए जाने वाले इन पौधों को अधिकतर लोग फालतू समझकर फेंक देते हैं।

दरअसल, इसका कारण ये है कि इन्हें किसी खरपतवार से कम नही माना जाता है। यदि आप भी आज तक इन पौधों को फालतू समझते आए हैं तो अब से
हम आपको बताते हैं कुछ पौधों के खास गुणों के बारे में –

लटजीरा/ “Chirchita”
उत्तर-मध्य भारत के लगभग हर सूबे में पाया जाने वाला ये पौधा बेशक कांटेदार (रोंए) होता है। चुभंतू होने के कारण कम ही लोग इसे जानते हैं, घास-फूस में पशुओं को खिलाते हैं। लेकिन आपको बता दें कि आयुर्वेद में ”लटजीरा” पौधे के ढेर सारे महत्व हैं। खाने की कढी़ में अगर इसे डाल दें तो कर्इ फायदे मिल जाते हैं। दाद – खुजली की समस्या हाे या त्वचा चिर जाए तो चिरोटा के बीजों को पानी में पीसकर उसका लेप करें।

दिए गए फोटोज़ छुएं और अंदर स्लाइड्स में पढें लटजीरा सहित अन्य पौधों के यूज के बारे में, जिन्हें अक्सर फेंक दिया जाता है फाल्तू समझकर…..

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खारे पानी को बना देगा मीठा, ट्रार्इ करें ये 1 पौधा

इस पौधे से खारा पानी मीठा होता है, जानिए इसेप्रकृति ने इतने उपहार सौंपे हैं कि अधिकतर लोग तो उन्हें यूज करना भी नहीं जानते। चाहे घर के पास उगने वाली घास हो या पनघट किनारे खड़ी झाडियां, सबमें कुछ न कुछ नेचुरल खूबियां छिपी हुर्इ हैं। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसे पौधे के बारे में जिससे खारे पानी को बनाया जा सकता है मीठा, कर्इ बीमारियां भी हो जाती हैं दूर :-

तो जानिए, वह पौधा जो जल काे करे शुद्घ
वंसुरी प्लांट @ Vijayrampatrika.Com
इस पौधे का नाम सुनने में थोड़ा अजीब है, हो सकता है शायद आप देख भी चुके हों। यह पौधा मैदानी भागों में, खासकर खेतों की मेड़-बरहा और ठेक पर उगता है। गर्मियों में (जून-जुलार्इ) यह आसानी से मिल जाता है। ब्रज के कुछ गांवों में लोग सालों से इसे यूज करते आए हैं, चूंकि यह न केवल प्यास बुझाने में सहायक है वरन् गर्मियों में होने वाली कर्इ बीमारियां भी इससे दूर की जा सकती हैं।

इस तरह हो जाता है पानी मीठा
The consumption of a grass: The water will be pure and sweet
वांसुरी पौधे की खासियत यह है कि इसकी पत्तियां बेनिफेशियल इंग्रेडेंट्स से भरपूर होती हैं। जब इन पत्तियों को चबाया जाता है तो मुंह में ठंडा और चीनी खाने जैसा स्वाद उत्पन्न हो जाता है। मवेशिए मीठे या ठंडे पानी के अभाव में, जब वंसुरी की पत्तियां चबाते हैं तो खारे पानी में मौजूद अवयव उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। इन्हें खाने के साथ वह पानी पीने पर मीठा लगता है।

ऐसे और पौधे हैं जो बहुपयोगी हो सकते हैं
पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में अक्सर चरावाहे ऐसे पौधों के बारे में जानते हैं। देश के कुछ इलाकों में जहां कुआ, झील या नलकूपों से खारा पानी निकल पाता है, उन जगह वंसुरी पौधे लगाने जरूर चाहिए। गाय, भैंस या बकरियां भी घास में मौजूद इन पौधों को चाव से खाती हैं। इसमें एक प्रकार की खास गंध पार्इ जाती है, जिससे हानिकारक कीटाणु पास नहीं फटकते।

वंसुरी पौधे से मिलने वाले अन्य लाभों के बारे में जानने के लिए छुएं दो फोटोज़, पढें स्लाइड्स में अंदर .. ..
यह भी पढि़ए : ये पौधा खा जाते हैं कीटों को, दूर रहना इनसे !
आपने चखी है कभी ये घास, बनाती है ताकतवर
इस आम के पेड़ को काटने पर खून निकल आता है !
इस पौधे को छुएंगे ताे मुरझा जाएंगी डाल

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देखिए रोज दूध-गाजर का नास्ता करता है ये बछडा़, एक भैंसे के नाम हैं 40 लाख सालाना!

0000002_Yuvrajपशु आदमी की जिन्दगी में काफी मददगार होते हैं, सच कहें तो इनके बिना जीवन भी संभव नहीं है। दैनिक जीवन में साथ रहने वाले घरेलू पशु तो खाने, पीने के साथ पैसा कमाने का आसान जरिया होते हैं इन्हीं में कुछ करतब कर कर के मालिक की पहचान बनवाते हैं। कहीं दूध देने वाला बकरा पाया जाता है तो कहीं साल में करोडों की कमार्इ कराने वाले भैंसे। इस तरह दुनिया में न जाने कितने जीव प्रकृति के अजब नमूने पेश करते हैं। फिलहाल हम जो बताने जा रहे हैं उससे आपको न केवल आश्चर्य होगा बल्कि उन जानवरों की पूरी हिस्ट्री भी जानना चाहेंगे। सो ज्यादा इंतजार न करते हुए सिलपट पढें…

दूध-गाजर का नाश्ता करने वाला बछडा़
आप भी भलिभांत जानते होंगे कि आमतौर पर पशुओं में एक लाख रुपए की कीमत घोड़े या भैंस की आंकी जाती है। लेकिन बछड़ा जिसे गाजर-दूध इत्यादि का तो नास्ता कराया जाए, माजरा बडा़ रोचक हो जाता है। हम बात कर रहे हैं मुज्जफरनगर के मोरना ब्रिडिंग टेक्नालॉजी व्रिकेताओं द्वारा खरीदे गए उस सांड की जो मालिक के यहां ऐसी फैसिलिटीज में रहता था कि ज्यादातर लोग भी नहीं रहते होंगे। उसकी खातिरदारी  फिलहाल भी कम नहीं मानी जाती है। लेकिन पहले ये सोचना तो बनता है कि आज कल बछड़े को फालतू की चीज समझ कर गलियों में आवारा पशुओं में छोड़ दिया जाता है। खेतों में निरे डोलते रहते हैं। किसी अनजान आदमी के घर भूल से पहुंच जाए तो लटठ् अगल से मिलते हैं। लेकिन ये जो आप देख रहे हैं न, गत फरवरी में बिलासपुर के एक गांव चौराही में बछडा ही डेढ लाख में बिका था। यहां तक पढने के बाद यह मान लिया जाए कि चलो इससे महंगे भी बिक चुके हों, लेकिन डाइट तो किसी की ऐसी नहीं होगी।

6 किलो फीड़ और 1 कोस की सैर
हालांकि अभी सर्दियां दूर हैं लेकिन गाजर, पत्ता गोभी के अभाव में भी यहां के डेयरी संचालक संजीव व कुलवंत सिंह तीन किलो दूध और 6 किलो फीड आदि खिलाते हैं। इतना ही नहीं मालिक के अनुसार, हर रोज कराई जाती है दो किलोमीटर की सैर! बता दें कि तीन साल के इस बछडे़ को बिलासपुर-चौराही रोड स्थित श्री कृष्णा डेयरी फार्म से फरवरी में मुजफ्फरनगर के 0000002_bacharaमोरना ब्रिडिंग टेक्नालॉजी के विक्रेताओं ने खरीदा था। यह इसलिए भी महत्व रखता है, चूंकि हॉलिस्टन फ्रिजियन (एचएफ) नस्ल में आता है। बोली के दौरान इस बछड़े को देखने के लिए दूर दराज से लोग पहुंचें। आम तौर पर पहले लोग बछड़ों को खेती के काम के लिए पालते थे, लेकिन अब इनकी बेकद्री ही होती आर्इ है।

ऐसे हुए सौदे की वजह..
यदि अहम बात और देखी जाए तो बछड़े की विशेषता उसकी लंबाई है। करीब 10 फुट 9 इंच लंबार्इ होना मायना रखता है जो आम बछड़ों से अधिक है। डेयरी संचालकों के अनुसार, जो चित्र में ये दिख रहा है यहां, की ऊंचाई चार फुट आठ इंच है। यह बछड़ा सर्वोत्तम नस्लों में गिना जाता है। इतना ही नहीं, इस बछड़े की मां हर रोज 38 लीटर दूध देती है। इस बछड़े की ब्रिडिंग से पैदा होने वाली बछड़ी से इससे भी अधिक दूध देने की उम्मीद जतार्इ गर्इं, इसलिए यह महंगे बिकने वाले पशुओं की कतार में शामिल हो गया।

खरीदने से पहले करने पडे़ कर्इ टेस्ट
जब मालिक से लेने का प्लान बना तो विक्रताओं ने बछडे़ की जांच की। ये लोग मोरना ब्रीडिंग टेक्नोलॉजी के संजय पंजेटा थे। खरीदने से पहले इस बछड़े के ब्लड व वीर्य के सैंपल लैब में टेस्ट कराए गए। और भी लोग मौके पर मौजूद थे। परीक्षणों में यह उच्च क्वालिटी का पाया गया। अंत में यह पक्का हुआ कि कृत्रिम गर्भधारण के लिए इसका इस्तेमाल करने में यह फिट रहेगा।

लोगों को सबक भी मिलने की वजह बना
देहाताें में आप आसानी से रंभाते हुए इन्हें देख सकते हैं, इन्हें आवारा पशुओं की श्रेणी में माना जाता है। लेकिन मारे-मारे घूम रहे इन पशुओं की इतनी कीमत हो सकती है यह जाना जाएगा इस बछडे की वजह से। इतना महंगा बिकने से दूसरे लोगों का भी रुझान बछड़ों की तरफ बढ़ेगा।

ये है युवी डोनर, साल में कमाता है 40 लाख से ज्यादा

0000001_Yuvrajजी हां, हैरत में मत पडिए, हरियाणा के कुरूक्षेत्र में किसान कर्मवीर सिंह के पास यह भैंसा है। इसे प्यार से युवी कहकर बुलाया जाता है। जबकि निकनेम के अलवा पूरा नाम है युवराज। उम्र सिर्फ पांच साल। कमाई चालीस लाख रुपए सालाना से भी ज्यादा। बताना जरूरी है कि यह मुर्रा नस्ल का है। और मालिक के यहां काम सिर्फ सीमन डोनेशन का है। शर्म की बात छोड़ दें तो अच्छी नस्ल की भैंसें पाने की चाह रखने वाले पूरे उत्तर भारत के हजारों किसान संपर्क में हैं। इसके मालिक कहते हैं कि युवी को खरीदने के लिए आंध्रप्रदेश के एक प्राइवेट सीमन बैंक ने 2.5 करोड़ रुपए का आफर किया, लेकिन ये बिकाऊ नहीं है। कर्मवीर का यह भैंसपति चप्पड़चिड़ी में होने वाली एग्रीकल्चर समिट में सबके आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। लेकिन भला ऐसा कौन सा किसान है कि ढार्इ करोड़ में भी एक पशु को न बेचे तो, जवाब साफ नजर आता है, चूंकि यह साल में लाखों कमाता है। मालिक के लिए, हां जी। इतना ही नहीं कमार्इ करने का दम 10 साल है इसमें मिनीमम! यानी पांच-छै करोड़ और खींच लेगा। साल दर साल जो दाम बढ़ेंगे, वे अलग से। तभी ठुकरा दिए जाते हैं ऑफर।

अच्छे-अच्छे आदमियों को खाने की खुराक नहीं मिलती और ये…
आप खुद देखिए पाजी, 15 किलो तो दूध पीता है कर्मवीर के अनुसार ये। बात यहीं नहीं रुकती, रोज नाश्ते में 5 किलो सेब और खाने की फितरत होती है युवी की। डेली डाइट के बारे में सुना जाए तो यह भैंसा 10 किलो दूध, 3 किलो दही और 10 किलो घास व अन्य चीजें खाता है। इसके अलावा वह रोज 6 किलोमीटर टहलता भी है। कर्मवीर के अनुसार, इस धांसू पशु की वजह 0000002_murrah-buffaloसे वह विभिन्न पशु मेलों में अब तक लाखों कमा पाए हैं, यानी इसे बेचने का मतलब है, ‘सोना का अंडा देने वाली मुर्गी का चिकन बना लेना। हालांकि इरादा आने का सवाल उठता ही नहीं है रत्तीभर।

इससे हुर्इ भैंस होती हैं दूध में भी अव्वल
इस साल फरवरी में मोहाली में लगे प्रोग्रेसिव पंजाब ऐग्रिकल्चर समिट 2014 जब दुनिया भर के किसान और पशु विशेषज्ञ जमा थे तो पंजाब राज्य किसान आयोग के एक विशेषज्ञ ने बताया कि युवी जैसी यानी मुर्रा प्रजाति, भैंस अन्य भैंस प्रजातियों की तुलना में ज्यादा दूध देती हैं, जिसकी वजह से यह पशु पालने वाले किसानों में काफी लोकप्रिय हैं। इस तरह यदि इससे हुर्इ हर भैंस 4 हजार लीटर दूध देती है, तो बाकी दूसरे नस्ल की भैंसें 2 हजार से 2200 लीटर तक ही सीमित रह जाती हैं।

घर बैठे ऐसे आता धन
कुरूक्षेत्र में रहने वाले इस किसान ने सरकारी के सीमन बैंक से टाईअप कर रखा है। यहां सीमन के इंजेक्शन तैयार किए जाते हैं। एक साल में करीब 80,000 इंजेक्शन बनते हैं। जब इतने तैयार होते हैं तो जाहिर है बिकते भी खूब होते होंगे। बेच दिए जाते हैं। अब पोस्ट कैसी लगी, हमें करें मेल… http://vijayhindicom@yahoo.inbraj text0012

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गायब होता गन्ना, ये मजबूरी है किसान की~मगर फिर भी हो खेती तो ऐसे

एक समय होता था जब गन्ने के लहलहाते खेत और उसमें से जीविका पर निर्भर किसान। लेकिन इसे सरकार की कमी कहें या रसूखदारों की बढती जमाखोरी, जिससे पारंपरिक फसलें गायब सी हो गईं हैं। आर्थिक लाभ का साधन जुटाने के भी रास्ते मानो टूट गए हों, ये स्थिति वाकई बुरी है। लेकिन सरकार नई है तो उपेक्षाएं जीवित होना जाहिर है, साथ ही चाहिए किसान को जैसे गन्ने, सरसों आदि फसल से अधिकतम उपज लेने का गुर। वे जानकारियां हम पेश करते रहेंगे। सबसे पहले गन्ने के बारे में समझते हैं वो भी बढिया कंटेट से-

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 Sugarcane की हो पेड़ी फसल, तो?

    एक बार बोए गये गन्ने की फसल  काट लेने के उपरान्त उसी गन्ने से दूसरी फसल लेने के प्रक्रिया को  पेड़ी कहते है । गन्ने की रोपी गई फसल की कटाई के उपरान्त उसी खेत में रोपित फसल की जड़ों से गन्ने के नये पौधे निकलते है। इससे गन्ने की जो फसल प्राप्त होती है उसे गन्ने की पेड़ी या जड़ी (रेटून) कहते है । आमतौर पर गन्ने की फसल से एक या दो पेड़ी की फसल अवश्य लेंना चाहिए। देश में लगभग दो तिहाई क्षेत्र में पेड़ी की फसल  ली जाती है।

       पेड़ी रखने से खेत की तैयारी, बीज एवं बुवाई का खर्च, श्रम एवं समय की बचत ह¨ती है । अतः पेड़ी फसल का उत्पादन व्यय कम आता है । पेड़ी फसल अपेक्षाकृत कम समय में पककर तैयार ह¨ जाती है जिससे उस खेत में दूसरी फसल जैसे गेहूँ, चना आदि की बुवाई समय से हो सकती है । पेड़ी की फसल शीघ्र तैयार ह¨ने के कारण चीनी मिलो  में शीघ्र पेराई कार्य शुरू हो  जाता है । पेड़ी की फसल लेने से मुख्य फसल में दी गई उर्वरको  की मात्रा  के अवशेष (विशेषकर स्फुर व पोटाश आदि) का उपयोग हो  जाता है । नई बोई गई फसल (नोलख) की अपेक्षा पड़ी फसल को  कम सिंचाई की आवश्यकता हो ती है । इस फसल से प्राप्त गन्ने में चीनी प्रतिशत अधिक पाया जाता है ।एक ही खेत में लगातार गन्ने की फसल  कई वर्ष तक खड़ी रहने के कारण फसल पर कीट-रोग का प्रकोप बढ़ जाता है । भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उपजाऊपन में कमी होती है । कभी-कभी फसल कमजोर होने के कारण उपज कम प्राप्त होती है जिससे आर्थिक नुकसान हो  सकता है ।

ये करना होगा तब, जब पेस न खा रही हो

गन्ना के बारे में भले ही सब जानते हैं मगर फसल दमदार कैसे होगी ये कम ही को आडव रहता है। इसलिए हमने विशेषज्ञों से बात की। उनके विचार लिए और फिर राह मेक की। गन्ना नाम जमता है पेडी श्रेणी से। पेड़ी फसल का उचित सस्य-प्रबन्धन न करने से गन्ने की उत्पादकता कम हो जाती है। प्रायः पेड़ी की पैदावार मुख्य फसल(नोलख) से कम होती है। पेड़ी की फसल से अधिकतम उपज लेने के लिए निम्न सस्य तकनीक अपनाना आवश्यक है ।

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1. पेडी हेतु उन्ही किस्मों का चयन करें जिनमें जड़ी उत्पादन क्षमता अधिक हो, उदाहरण के लिए को-86032, को-85004 (प्रभा)आदि।

2. पेड़ी के लिये गन्ने को सही समय पर काटना चाहिये। फरवरी के पहले सप्ताह तक काटे गये गन्ने की पेड़ी अच्छी होती है।  मार्च के बाद काटे गये गन्ने की पेडी़ अच्छी नही होती हैं।
3. गन्ने की पहली फसल (नोलख) क¨ जमीन की सतह के पास से ही काटा जावें ।ऊपर से काटने पर कल्लो  की संख्या कम हो  जाती है । यदि मिट्टी चढ़ाई गई हो , तो  अच्छा यही रहेगा कि मिट्टी को  गिराने के बाद ही गन्ना काटा जाए ।
4. कटाई कें तुरंत बाद कुडें कचरे तथा सूखी पत्तियों  को आग लगाकर जला देना चाहियें। इन पत्तियों को खेत में सडा दिया जाए तो खाद का कार्य करेंगी परंतु भूमि में पत्तियां खाद के लिए छोडना होतो भूमि का उपचार आवश्यक रहता है।
5. पेड़ी वाले खेत में, जहाँ जगह खाली हो वहाँ नया गन्ना लगाएं। इस कार्य हेतु गन्ने का ऊपरी भाग प्रयोंग में लायें। गन्ने के टुकडे बोने का उचित समय वही होगा जब खेत पहली सिंचाई के बाद काम करने की स्थिति में आ जाये।
6. पेड़ी मे मुख्य फसल की तुलना मे अधिक सिंचाइयों क आवश्यकता होती है, इसलिये उसमें अधिक पानी देना चाहिये। प्रत्येक सिंचाई में 6-7 सेमी. पानी देना चाहिये। वर्षा ऋतु के पहले 15 दिन के अंतर से तथा बाद में 20 दिन के अंतर से सिंचाई करते रहना चाहिये।
7. खेत के बतर में आने पर गरेडों के दोनो ओर हल चलाकर पुरानी गरेडों (नालियाँ) को तोड़ देना चाहिए। इससे पुरानी जड़ टूट जाती है तथा भूमि में वायु संचार बढ़ जाता हैं जिससे नई जड़ों का विकास होता है।
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8. पेड़ी को मुख्य फसल की अपेक्षा अधिक खाद-उर्वरक की आवश्यकता होती है। अतः इसमे गोबर की खाद 12-15 गाड़ी, 300 कि. ग्रा. नत्रजन, 75 कि.ग्रा. स्फुर व 25 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना चाहिये।नत्रजन की एक तिहाई मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा गरेडों (नालियो) में   देना चाहिए। नत्रजन का दूसरा भाग, तीन माह बाद तथा शेष एक तिहाई, अंतिम बार मिट्टी चढ़ाते समय देना चाहिये।
9. खाद देने के बाद देशी हल या रिजर में पटिया बाँध कर गन्ने के ठुठों पर मिटटी चढाएँ तथा सिंचाई करें।
10. पेड़ी फसल में भी जैव उर्वरक यथा 2.5 कि. ग्रा. एजोटोबैक्टर व 5 कि. ग्रा. पी. एस. बी.प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करने से नत्रजन व स्फुर की  लगभग 20 प्रतिशत बचत होती है।
11. कीट-बीमारियों से प्रभावित फसल की पेड़ी कभी नही लेना चहिये। पेड़ी फसल के ठुँठो  पर एमीसान -6 दवा 300 ग्रा. 400 लिटर पानी  घोलकर हजारे की  मदद से छिडकें। यदि पपड़ी कीट की आशंका हो तो उपरोक्त दवा के साथ मैलाथियान 50 ई. सी. 750 मि. ली. मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।
12. फसल पर मिटटी चढ़ाना तथा पौधों की बँधाई करना भी आवश्यक है। जब पौधों की लम्बाई 7-8 फुट हो जावे (वर्षा ऋतु) तो बँधाई का काम शुरू कर देना चाहिये।
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13. पेड़ी फसल मुख्य फसल की अपेक्षा जल्दी पककर तैयार हो जाती हैं। अतः इसे पहले ही काट लेना चाहिये । जल्दी पकने वाली किस्मो  की पेडी 9-10 महीने में पककर तैयार हो जाती हैं तथा देर से पकने देर से पकने वाले गन्ने 10-12 महीने में तैयार होती है। देर से काटने पर पैदावार कम मिलने के अलावा शक्कर की मात्रा में कमी आ जाती है और गुड भी दानेदार नहीं बनता है।

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