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करवा चौथः जानिए क्यों पूजते हैं चांद, पति को क्यों देखते हैं छलनी से?

Karva Chauth》जीवन दर्शन Desk: हिंदू परंपरा के अंतर्गत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 30 अक्टूबर, शुक्रवार को है। इस दिन महिलाएं चंद्रमा की पूजा कर अपना व्रत खोलती हैं। इस दिन चंद्रमा की ही पूजा क्यों की जाती है? इस संबंध में कई कथाएं व किवंदतियां प्रचलित हैं। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने के संबंध में एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। उसके अनुसार-

रामचरितमानस के लंका कांड के अनुसार, जिस समय भगवान श्रीराम समुद्र पार कर लंका में स्थित सुबेल पर्वत पर उतरे और श्रीराम ने पूर्व दिशा की ओर चमकते हुए चंद्रमा को देखा तो अपने साथियों से पूछा – चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है? सभी ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जवाब दिया। किसी ने कहा चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई देती है।
किसी ने कहा राहु की मार के कारण चंद्रमा में कालापन है तो किसी ने कहा कि आकाश की काली छाया उसमें दिखाई देती है। तब भगवान श्रीराम ने कहा- विष यानी जहर चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है। इसीलिए उसने विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है, जिसके कारण चंद्रमा में कालापन दिखाई देता है। अपनी विषयुक्त किरणों को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।

इस पूरे प्रसंग का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि जो पति-पत्नी किसी कारणवश एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं, चंद्रमा की विषयुक्त किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचाती हैं। इसलिए करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा कर महिलाएं ये कामना करती हैं कि किसी भी कारण उन्हें अपने प्रियतम का वियोग न सहना पड़े। यही कारण है कि करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने का विधान है।

दिए गए फोटोज़ छुएं और अंदर स्लाइड में जानिए महिलाएं छलनी से क्यों देखती हैं पति को –
8 अक्टूबर, रविवार को करवा चौथ है, इस मौके पर Vijayrampatrika.com की विशेष प्रस्तुति आपके लिए। ये लिंक्स क्लिक करें…….

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करवाचौथ व्रत की कथा जानने के लिए यहां क्लिक करें।

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देखिए ये रहीं स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां, यहीं वाल्मीकि ने लिखी थी रामायण

 Valmiki Ashram Temple (Kanpur, India): Address, Religious Site》जीवन दर्शन Desk: भगवान राम और श्रीकृष्ण को धरती पर आए भले ही लाखों साल बीत गए हों, लेकिन धरती पर सतयुग की सीढ़ियां आज भी मौजूद हैं। ये सीढ़ियां सीधे स्वर्ग तक ले जाती हैं। यूपी में कानपुर से 28 किलोमीटर दूर एक छोटी सी जगह ‘बिठूर’ है। यहीं पर वाल्‍मीकि का आश्रम है, जहां बैठकर उन्होंने रामायण की रचना की थी। इसी आश्रम में सीता ने लव-कुश नाम के दो बेटों को जन्म दिया था।

Valmiki Ashram Temple in bithoor
ये आश्रम काफी ऊंचाई पर बना हुआ है। इसलिए यहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं। इन सीढ़ियों को स्‍वर्ग जाने की सीढ़ी कहा जाता है। स्‍थानीय लोग इसे ‘सरग नशेनी’ भी कहते हैं। बताया जाता है कि इस आश्रम की आखिरी सीढ़ी से पूरे बिठूर का सुंदर नजारा देखा जा सकता है।

सीता की रसोई के पास बनी हैं स्वर्ग की सीढ़ियां
यहां के पंडित नंदकिशोर दीक्षित बताते हैं कि जब भगवान राम के आदेश पर लक्ष्मण ने सीता को जंगल में छोड़ दिया था तो वो भटकती हुईं यहां पहुंची थीं। यहीं पर उनकी मुलाकात वाल्‍मीकि से हुई थी। इसके बाद वो उन्‍हें बिठूर के आश्रम में लेकर गए। उनका आश्रम आज भी यहां पर बना हुआ है। इस आश्रम का मुख्य द्वार Lav and Kush (from Ramayana) birth place temple in Bithoorकाफी ऊंचाई पर स्‍थित है। इसके पास ही सीता की रसोई भी है, जिसके पास स्वर्ग की सीढ़ियां बनी हुई हैं।

नाना पेशवा ने बनवाई थी सीढ़ियां
पंडित नंदकिशोर दीक्षित बताते हैं कि इसमें 65 सीढ़ियां और सात फेरे बने हुए हैं। पहले यहां दीपक जलाकर रखा जाता था, जिन्‍हें ‘दीप मालिका’ भी कहा जाता है। नंद किशोर दीक्षित की मानें तो इन सीढ़ियों को नाना पेशवा ने बनवाया था। इसके बगल में एक घंटा भी लगा है। कहा जाता है कि जब इस घंटे को बजाया जाता था तो तात्या टोपे को पता चल जाता था कि उन्हें बुलाया जा रहा है।

यहीं पर रहकर वाल्‍मीकि ने की थी रामायण की रचना
वाल्मीकि आश्रम में तीन मंदिर हैं। इनमें से एक मंदिर खुद वाल्मीकि का है, जिसमें उनकी प्रतिमा है। वे पद्मासन की मुद्रा में बैठे हुए हैं और दाएं हाथ में लेखनी लिए हुए हैं। यहीं पर रहकर उन्‍होंने रामायण की रचना की थी। उनके पास ही भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है, जहां भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए मुद्रा में हैं। दिए गए फोटोज़ छुएं और अंदर स्लाइड्स में पढें कैसे हुआ लव-कुश का जन्म, ब्रह्माजी ने क्यों इस आश्रम में स्थापित किया शिवलिंग और आज कैसा है सीताकुंड...

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राधा जन्माष्टमी कल: मां के गर्भ से नहीं जन्मीं राधा, ऐसे करें पूजा

राधा जन्माष्टमी आज: ये है पूजन विधि》जीवन दर्शन Desk: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि (इस बार 29 अगस्त, मंगलवार) को राधा जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन व्रज में श्रीकृष्ण के प्रेयसी राधा का जन्म हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा भी श्रीकृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं, उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ। इस पुराण में राधा के संबंध में बहुत ही ऐसी बातें बताई गई हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं।

ये बातें इस प्रकार हैं –
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण के बाएं अंग से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई, प्रकट होते ही उसने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में फूल अर्पित किए। श्रीकृष्ण से बात करते-करते वह उनके साथ सिंहासन पर बैठ गई। यह सुंदर कन्या ही राधा हैं।

– एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण विरजादेवी के समीप थे। श्रीराधा को यह ठीक नहीं लगा। श्रीराधा सखियों सहित वहां जाने लगीं, तब श्रीदामा नामक गोप ने उन्हें रोका। इस पर श्रीराधा ने उस गोप को असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब उस गोप ने भी श्रीराधा को यह श्राप दिया कि आपको भी मानव योनि में जन्म लेना पड़ेगा। वहां गोकुल में श्रीहरि के ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। …अब यहां से आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें दी गर्इ स्लाइड्स पर

Vijayrampatrika.com पर आप जान सकते हैं श्रीराधे से जुड़ी हर बात, कैसे उन्होंने श्रीकृष्ण संग रास रचाया, किस स्थान पर वह अवतरित हुर्इं और आज उन गावों की स्थिति कैसी है, बरसाने के प्रमुख मंदिर कौन-कौन से हैं आदि-आदि। अपनी पसंद देखने के लिए इन लिंक्स को क्लिक करें –

इस गांव की थीं राधा, कृष्ण संग एक पेड़ में दिख रही परछार्इ
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यहां सबकी तकलीफें दूर करते हैं शनिदेव

यहां सबकी तकलीफें दूर करते हैं शनिदेव 》जीवन दर्शन Desk: शनि के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए लोग कई उपाय करते हैं जैसे- पूजा, पाठ, दान, दर्शन आदि। शनि देव की कई प्रसिद्ध मंदिर भी हमारे देश हैं, उन्हीं में से एक है मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित शनिश्चरा मंदिर।

Vijayrampatrika.com आपको शनिदेव के तीर्थों के दर्शन करा रहा है। इस बार शनि जयंती 25 मर्इ, 2017, गुरुवार को है। सूर्यपुत्र की विशेष अराधना विधि जानने के लिए यहां क्लिक करें।

क्यों है खास- यह शनि मंदिर भारत के पुराने शनि मंदिरों में से एक है। लोक मान्यता है कि यह शनि पिण्ड भगवान हनुमान ने लंका से फेंका था जो यहां आकर गिरा। यहां शनि को तेल चढ़ाने के बाद उनसे गले मिलने की प्रथा भी है। जो भी यहां आता है वह बड़े प्यार से शनि महाराज से गले मिलता है और अपनी तकलीफ उनसे बांटता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से शनि उस व्यक्ति की सारी तकलीफें दूर कर देते हैं।

कैसे पहुंचें- शनिश्चरा मंदिर ग्वालियर-भिण्ड रेलवे लाइन पर पड़ता है। ग्वालियर दिल्ली-मुंबई रेल खण्ड का प्रसिद्ध स्टेशन है। ग्वालियर से बसों व टैक्सियों से भी शनिश्चरा पहुंचा जा सकता है। देश के कई शहरों से ग्वालियर के लिए सीधी हवाई सेवा है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया हवाई अड्डे से शनिश्चरा मंदिर सिर्फ 15 किलोमीटर दूर है। शनि अमावस्या पर यहां काफी भीड़ होती है। उस दिन स्पेशल ट्रेन और बसें मंदिर तक के लिए चलाई जाती हैं।

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हजारों साल पुराना है ये हनुमान मंदिर, मुगल भी नहीं तोड़ पाए इसे

this-hanuman-temple-is-thousands-years-old-it-did-not-break-even-mughal》जीवन दर्शन Desk: महावीर हनुमान को कलयुग का साक्षात देवता माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान हनुमान आज भी धरती पर मौजूद हैं। कई पुराणों और ग्रंथों में यह बात पाई जाती है। हनुमान को अजर-अमर देवता माना जाता है।
उनके कई विशाल मंदिर और मूर्तियां भारत में विभिन्न स्थानों पर हैं, लेकिन आपको यह बात जान कर आश्चर्य होगा यहां कुछ मंदिर अपनी विशेषताओं के कारण दुनिया में विख्यात हैं। जहां न की सिर्फ भगवान हनुमान को पूजा जाता है, साथ ही उनकी प्राचीन मूर्तियां भी हैं।

11 अप्रैल 2017, हनुमान जयंती है। इस अवसर पर Vijayrampatrika.com आपको महावीर हनुमान से जुडे़ मंत्र, वॉर्शिप मेथॉड्स और प्रमुख मंदिरों के बारे में बता रहा है। इस कडी़ में आज आपको कराते हैं 8 विशेष मंदिरों के दर्शन…

1. हनुमान मंदिर, इलाहबाद
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद किले से सटा यह मंदिर लेटे हुए हनुमानजी की प्रतिमा वाला एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है। यह सम्पूर्ण भारत का एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमानजी लेटी हुई मुद्रा में हैं। यहां पर स्थापित हनुमानजी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है। जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है।

जीभर पच लिए मुगल पर नहीं टूटा
भारत में मुगलों का आगमन अरब कंट्रीज से हुआ। उन्होंने छोटे-मोटे राजाओं पर हमला किए, राज्यों को लूटा। नगर में घुसकर हिंदू बच्चे-जवान मार दिए जाते थे और महिलाओं का शोषण करते थे। इसी वजूद में जब अंतिम मुस्लिम बादशाह औरंगजेब ने अपने साम्राज्य में मंदिरों को तुड़वाने आदेश दिया तो सैनिक इलाहबाद भी पहुंचे। लेकिन इस मंदिर को तोड़ न सके।

 Top 10: हजारों साल पुराना है ये हनुमान मंदिर, मुगल भी नहीं तोड़ पाए इसेयह भी पढें: इस मंदिर में है हनुमानजी के पुत्र की प्रतिमा
भारत के बाहर इन देशों में हैं भगवान हनुमान की विशाल मूर्तियां

2. हनुमानगढ़ी, अयोध्या
अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। यहां का सबसे प्रमुख श्रीहनुमान मंदिर हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। इसमें 60 सीढिय़ां चढऩे के बाद श्रीहनुमानजी का मंदिर आता है। यह मंदिर काफी बड़ा है। मंदिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, जिनमें साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक स्थान हैं। इस मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पहले स्वामी अभयारामदासजी ने की थी।

3. सालासर हनुमान मंदिर, सालासर
हनुमानजी का यह मंदिर राजस्थान के चूरू जिले में है। गांव का नाम सालासर है, इसलिए सालासर वाले बालाजी के नाम यह मंदिर प्रसिद्ध है। हनुमानजी की यह प्रतिमा दाढ़ी व मूंछ से सुशोभित है। यह मंदिर पर्याप्त बड़ा है। चारों ओर यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनी हुई हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मनचाहा वरदान पाते हैं।
इस मंदिर के संस्थापक श्री मोहनदास जी बचपन से श्री हनुमान जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। माना जाता है कि हनुमान जी की यह प्रतिमा एक किसान को जमीन जोतते समय मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया है। यहाँ हर साल भाद्रपद, आश्विन, चैत्र एवं वैशाख की पूर्णिमा के दिन विशाल मेला लगता है।

4. हनुमान धारा, चित्रकूट
उत्तर प्रदेश के सीतापुर नामक स्थान के समीप यह हनुमान मंदिर स्थापित है। सीतापुर से हनुमान धारा की दूरी तीन मील है। यह स्थान पर्वतमाला के मध्यभाग में स्थित है। पहाड़ के सहारे हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति के ठीक सिर पर दो जल के कुंड हैं, जो हमेशा जल से भरे रहते हैं और उनमें से निरंतर पानी बहता रहता है। इस धारा का जल हनुमानजी को स्पर्श करता हुआ बहता है। इसीलिए इसे हनुमान धारा कहते हैं। धारा का जल पहाड़ में ही विलीन हो जाता है। उसे लोग प्रभाती नदी या पातालगंगा कहते हैं।

इस स्थान के बारे में एक कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है-
श्रीराम के अयोध्या में राज्याभिषेक होने के बाद एक दिन हनुमानजी ने भगवान श्रीरामचंद्र से कहा- हे भगवन। मुझे कोई ऐसा स्थान बतलाइए, जहां लंका दहन से उत्पन्न मेरे शरीर का ताप मिट सके। तब भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को यह स्थान बताया।

5. श्री संकटमोचन मंदिर, वाराणसी
यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है। इस मंदिर के चारों ओर एक छोटा सा वन है। यहां का वातावरण एकांत, शांत एवं उपासकों के लिए दिव्य साधना स्थली के योग्य है। मंदिर के प्रांगण में श्रीहनुमानजी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। श्री संकटमोचन हनुमान मंदिर के समीप ही भगवान श्रीनृसिंह का मंदिर भी स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के तप एवं पुण्य से प्रकट हुई मूर्ति है।

इस मूर्ति में हनुमानजी दाएं हाथ में भक्तों को अभयदान कर रहे हैं एवं बायां हाथ उनके ह्रदय पर स्थित है। प्रत्येक कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमानजी की सूर्योदय के समय विशेष आरती एवं पूजन समारोह होता है। उसी प्रकार चैत्र पूर्णिमा के दिन यहां श्रीहनुमान जयंती महोत्सव होता है। इस अवसर पर श्रीहनुमानजी की बैठक की झांकी होती है और चार दिन तक रामायण सम्मेलन महोत्सव एवं संगीत सम्मेलन होता है।

 बाढ़ में डूब जाती है हनुमानजी की ये मूर्ति, ले जाते हैं दूसरी जगह6. बेट द्वारका, गुजरात
बेट द्वारका से चार मील की दूरी पर मकर ध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। अहिरावण ने भगवान श्रीराम लक्ष्मण को इसी स्थान पर छिपा कर रखा था।

जब हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेने के लिए आए, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी ने उसे परास्त कर उसी की पूंछ से उसे बांध दिया। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है। कुछ धर्म ग्रंथों में मकरध्वज को हनुमानजी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था।

हनुमान जी के 10 सबसे बडे़ मंदिरों के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
बजरंग बली को प्रसन्न करने के कुछ अनूठे उपाय
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7. हंपी, कर्नाटक
बेल्लारी जिले के हंपी नामक नगर में एक हनुमान मंदिर स्थापित है। इस मंदिर में प्रतिष्ठित हनुमानजी को यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। विद्वानों के मतानुसार यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी है। वाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस में इस स्थान का वर्णन मिलता है।
संभवतया इसी स्थान पर किसी समय वानरों का विशाल साम्राज्य स्थापित था। आज भी यहां अनेक गुफाएं हैं। इस मंदिर में श्रीरामनवमी के दिन से लेकर तीन दिन तक विशाल उत्सव मनाया जाता है।

8. श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर (गुजरात)
अहमदाबाद-भावनगर रेलवे लाइन पर स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर लगभग 12 मील दूर है। यहां एक प्रसिद्ध मारुति प्रतिमा है। महायोगिराज गोपालानंद स्वामी ने इस शिला मूर्ति की प्रतिष्ठा विक्रम संवत् 1905 आश्विन कृष्ण पंचमी के दिन की थी।
जनश्रुति है कि प्रतिष्ठा के समय मूर्ति में श्रीहनुमानजी का आवेश हुआ और यह हिलने लगी। तभी से इस मंदिर को कष्टभंजन हनुमान मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एकमात्र हनुमान मंदिर है।

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