INVESTIGATIONS: दंगे होते किसके कसूर से हैं, देखें दो सबसे बडी़ घटना

क्यों होते हैं दंगे, किसका है कसूर, इस एक घटना से यूं समझेंआजाद पारेख | हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जिसे दुनिया में शांति, आस्था और भाइचारे की जन्मभूमि माना गया है। यहां हर महजब के लोग हैं और सबके लिए सबसे ज्यादा देवालय भी। यहां सबसे ज्यादा भाषा हैं, बोलिया हैं और भिन्न-भिन्न रहन-सहन भी। फिर वजह क्या है ऐसे हिचकोलों की, क्यों होते हैं दंगे, क्यों लोग इंसानियत की सिर्फ करते हैं, क्या निर्दोष पशुओं को मारकर खाना उन लोगों की अभिन्न प्रकृति है…. देखें सभी पहलू और जानें एक नजर में……

सबसे पहले एक वह घटना,
जिसने केवल हिंदुस्तान की धर्मनिरपेक्षता पर चोट पहुंचार्इ, बल्कि ”सनातन” की साख पर नफरत के अंगारे भी फोड़े। कथित ‘धर्म’ के ठेकेदारों ने बच्चे पैदा करने, गायों को मारने, दूसरे महजबिए पर काबिज होने, संस्कृति और संस्कारों को भ्रांति बताने और हिंसा के जरिए ”जन्नत” दिलाने सुर जन-गणों में भरा :

शुरुआत गुजरात से
हिंदुस्तान में विदेशी ताकतों के आने व निकलने तक बंबर्इ में गिना जाने वाली रियासत, उससे पहले अपने पौराणिक महत्व के कारण जानी जाती रही। यहां 5,000 बरस पूर्व तक के अवशेष (द्वारिका) मिल चुके हैं। लगभग 9 सौ बरस पूर्व भारत में अपने आगमन के साथ ही, इस्लाम ने यहां भी अपने पैर जमाए। इसके बाद आजाद गणतंत्र बनने तक लोगों की कर्इ ‘वराइटी’ हो गर्इं। खासतौर पर जब 90 का दशक अाया, गुजरात में वराइटी के बीच चिंगारियां शुरू हो गर्इं। इक्कीस वीं सदी आते ही सांप्रदायिकता का विकराल माहौल बना। नर्इ सदी में सवा साल भी प्रवेश नहीं कर पाए, दंगे शब्द ने जन्म ले लिया। हालांकि फसाद तो पहले भी हुए, लोग मरे भी बहुत थे। लेकिन दुनिया में कहानी इन घटनाओं से भारत के नाम फैली। गोधरा नरसंहार हुआ, लेकिन ‘दो हाथ बिन ताली’ ये कहावत तो झूंट है नहीं। लिहाजा जो मिला, दुष्परिणाम। इस दौरान हुर्इ सैकडों मौंतें, आगे चलकर हजारों तक पहुंच गर्इं।

गोधरा की कडी़
अंग्रेजों से आजादी मिलने के साथ ही हिंदुस्तान ने दो दंश झेले, काश ऐसा होता ही न ! महजब के आधार पर कथित जनप्रतिनितिधियों ने देश के टुकडे कराने में अंग्रेजों के साथ प्लानिंग की। एक प्योर मुस्लिम राष्ट्र बना और दूसरा वह जिसमें सभी शामिल थे। 14 अगस्त को पाकिस्तान के उत्थान की घोषणा के साथ ही लाहौर, कराची, सिंध आदि हिस्सों से हिंदुओं का हिंदुस्तान पलायन होने लगा। दूसरे पाकिस्तान (बांग्लादेश) से भी ऐसी जान लील-भगदड़ मची, प्रतिक्रिया हिंदुस्तान में भी दी गर्इ। कितने मरे, कितनी महिला और बच्चियां उन कट्टरपंथियों के हत्थे चढीं, बुजुर्गों से सुन सकते हैं, लेकिन आंकडे किसी के पास नहीं हैं। गोधरा पाकिस्तान के नजदीक था, इसलिए वहां उसके जैसी वराइटी का ‘जोर’ जमा हो गया। पहली बार मीडिया रिपोर्ट तब बनी, जब 1980 में गोधरा रेलवे यार्ड के पास 2 बच्चों सहित 5 हिंदुओं के कत्लेआम से कोहराम मच गया। 1990 में दो महिलाओं सहित 4 हिंदु शिक्षकों के मदरसे में मारे जाने की घटना छपी। Muslim militants have more role in riots or tensions - yes and no? . do you vot here... Www.vijayrampatrika.com

फिर नरसंहार कांड
अयोध्या में रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद वाली आग की तपिश पूरे देश में महसूस की गर्इ। 2002 में नफरत की स्याह रातें तब आर्इं जब, लखनऊ से साबरमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से 4 घंटे देरी से गोधरा पहुंची। 27 फरवरी के दिन सुबह करीब पौने 8 बजे एक्सप्रेस जैसे ही प्लेटफार्म छोड़कर आगे बढी़, कि जंजीर खिंच गर्इ। कुछ लोगों ने तत्काल एस-6 और एस-7 डिब्बे के बीच का जोड़ काट दिया। बोगियां बाहर से बंद कर दी गर्इं, जिनमें अधिकतर अयोध्या से लौट रहे कारसेवक बैठे थे। यह सब ऐसा योजनानुसार जानलेवा षडयंत्र था, जिससे इन बोगियों में सवार लोगों का बचना नामुमकिन रहा। धर्मांन्ध भीड ने बोगियां आग के हवाले कर दीं। जो कुछ एस-7 से बाहर निकले, वे भी बचने में असमर्थ रहे।

पुलिस के पहुंचने तक मौत नंगी नाचती रही। बहुत मशक्कत के पश्चात् हमलावर खदेडे गए, लेकिन करीब 3 घंटे बाद दंगार्इयों की भीड़ ने पुलिस व पूजा कर लौटे तीर्थयात्रियों को पुन: घेर लिया। इस दौरान पुलिस ने 7 सिपाहियों के घायल होने की पुष्टि की। वहीं 2 दंगार्इ पुलिस द्वारा मार गिराए गए। मौके पर 59 कारसेवकों के शव बरामद किए गए, जिनमें 15 बच्चे और 25 औरतें शामिल थीं। मृतकों के शरीर पर तेज धारदार हथियार चाकू, छुरियां और बंदूकों से प्रहार किए गए। इस भयानक हत्याकांड के बाद ”सेक्युलरिज्म” का बुरका पहने कुछ संगठनों व दलों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हद तो तब हो गर्इ जब, इस्लामी उग्रवादियों ने इसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की उचित प्रतिक्रिया बताते हुए जायज ठहराने की कोशिश की। इस नीच-कृत्य का परिणाम यह हुआ कि पूरे गुजरात में दंगों की आग सुलग गर्इ। इस दौरान करीब 2 हजार जानें गर्इं। जिनमें किस महजब से कितने मरे, इसे लेकर सेक्युलरजादों ने खूब हो-हल्ला मचाया।

मोदी के पाले पड़ा नरसंहार
इन दंगों के समय गुजरात में नरेंद्र भार्इ मोदी की सरकार थी। जनप्रतिनिधि होने का दायित्व होने के कारण नरसंहार का दंश मोदी के पाले पड़ गया। जबकि राज्य सरकार का दावेनुसार, इस तरह की घटनाएं रोकने की भरपूर कोशिश की गर्इ। खुद मुख्यमंंत्री ने घटनास्थलों पर पहुंच हालात काबू किए जाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उनके सुरक्षा सलाहकारों ने उग्रवादियों से संभावित हमले का खतरा भांपकर उन्हें सरकारी विमान की इजाजत नहीं दी। हालांकि इन सबके बावजूद निजी वाहन के जरिए वे मृतकों व पीडितों तक पहुंचे। मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जहां (दंगों में मारे गए कांग्रेस सांसद की पत्नी) जाफरी ने दंगों की कालिख मोदी पर पोती। राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि जिस दिन गुजरात दंगों की भेंट चढा़, बजट पेश किया जा रहा था। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों की बेकाबू भीड़ के चलते ‘शूटआउट’ का सहारा लेना पड़ा। जिसके बाद स्थिति नियंत्रण में आ सकी।

संगठनों ने की अगुवार्इ !
सांप्रदायिक मारकाट में पुलिस व जांच एजेंसियों को कुछ उग्रवादी संगठनों की भूमिका हाथ लगी। गुजरात के सुरक्षाबलों ने इन्वेस्टिगेशन जारी कर, दंगों की आग इस्लामिक गुटों द्वारा भडकाए जाने की बात कही। दंगों में मोहम्मद कलोटा, हाजी बिलाल, ”जमीअत-उलमा-इ-हिंद” आदि द्वारा उकसाने की भूमिका सामने आर्इ। कोर्ट में सभी पक्षों ने अपनी-अपने हथकंडे अपनाए। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेर्इ ने जहां गुजरात सरकार को ‘राजधर्म’ निभाने की नसीहत दी। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस और मीडिया संगठनों ने भाजपा सरकार को आडे़ हाथों लिया, हालांकि कर्इ साल बाद सामने आर्इ एसआर्इटी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी की कथित भूमिका का कोर्इ साक्ष्य नहीं मिला। दंगों की जांच को अदालत द्वारा गठित कमेटी ने 2011 में 11 फांसी व 20 को उम्रकैद की सजा सुनार्इ। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के मुख्यमंत्री पर लगे आरोपों को हटाते हुए उन्हें क्लीनचिट दे दी।

गोधरा बनाम 1984 के दंगे
गुजरात दंगों से पूर्व पंजाब में 1984 में हुआ नरसंहार भी भारतीय इतिहास की बडी़ शर्मनाक घटना है। इसकी क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 5,000 से अधिक लोगों के कत्लेआम की विभीषका सामने आर्इ। दंगों का दंश लगातार तीन दिन तक चला, इस दौरान कांग्रेस उत्तराधिकारी राजीव गांधी पर उंगलियां उठीं। मीडिया में उनके हवाले से दंगे को जायज ठहराने की बात तब सामने आर्इ, जब उन्होंने कहा, – जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है।” इन दंगों में बडी़ तादाद में सिख मारे गए। यद्यपि गुजरात दंगे मामले में मोदी पर लगे सारे आरोप कोर्ट ने निरस्त कर दिए, लेकिन कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी (राजीव गांधी की पत्नी) ने उन्हें ”मौत का सौदागर” तक कहा। इसके बावजूद गुजरात में फिर भाजपा की सरकार बनी। मोदी को कोर्ट द्वारा निर्दोष साबित किए जाने के बाद भी विरोधियों द्वारा घेरे जाने पर कुछ हिंदुवादियों ने ‘बद अच्छा बदनाम बुरा’ कहावत को दोहराया। आज भी दोनों दंगे के आरोपियों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

यूपी में सबसे ज्यादा दंगे
देश के सबसे बडे़ राज्य उत्तर प्रदेश में दंगे-फसाद की दंश सबसे ज्यादा है। यहां हर साल छोटे-बडे सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगे में राज्य सरकार पर खूब उंगली उठीं। लेकिन बावजूद पीडितों की मदद करने के, घटनास्पद जिले में डांस कार्यक्रम आयोजित किए गए। यूपी में लखनऊ, मुजफ्फरनगर, मथुरा, मेरठ, अलीगढ़ आदि क्षेत्र दंगों के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं। इंसानों के साथ ही इनमें बडे़ पैमाने पर जानवरों (गाय, बकरे,ऊंट) का कत्लेआम देखा गया है।

दंगे कैसे होते हैं
हिंदुस्तान में अब महजबों के आधार पर ढेर सारे सांप्रदायिक गुट बन गए हैं। कुछ राजनीति के जरिए लोगों को ब्रेनवॉश करते हैं, तो कुछ अल्पसंख्यक कार्ड के जरिए। जब कहीं कोर्इ घटना होती है, तो उस क्षेत्र से संबंधित उग्रवादी दल बजाए शांत कराने के उसे हवा देते हैं। कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में ऐसे सक्रिय संगठनों की संख्या अधिक है। कश्मीर तो आए दिन हिंसा की आग में जलने को मजबूर है। वहींं सोशल मीडिया पर विभिन्न मंचों द्वारा उकसाने की गतिविधियां चलती रहती हैं। कर्इ इस्लामिक उग्रवादी गुटों (आतंकियों) पर देश में बैन भी लगाया जा चुका है।

Source: Wikipedia.org, bbc.com/ 120223_gujarat_case_status, Wikipedia.org/wiki/1984_anti-Sikh_riots and more.

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