‘मैं इसे भस्म कर दुंगा’ कहकर गायब हो गया था तांत्रिक, जानिए भानगढ़ के बारे में अनसुनी बातें

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 आपने भी सुना होगा न कि, राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है। इस किले की यात्रा के लिए अलवर व जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा जाया जा सकता है रेल मार्ग से भी दौसा रेल्वे स्टेशन से उतर कर सड़क मार्ग से इस जगह पहुंचा जा सकता है दौसा से भानगढ़ की दूूरी २२ किलोमीटर है। जबकि जयपुर व अलवर दोनों जगहों से लगभग ८० किलोमीटर है। बताते हैं कि यहां जो तांत्रिक था, भस्म कर देने की मंशा से किले पर आधिपत्य जमाया था तभी से भयानक गतिविधियां Bangdh + Fort + historical heritage होती रही हैं। हमने हाल ही में गए अपने यहां के कर्इ मुसाफिरों से सटीक ब्यौरा कुछ ऐसे लिया –

भानगढ़ के किले व नगर की उजड़ने की कई कहानियां प्रचलित है जिनमें रानी रत्नावती व एक तांत्रिक की कहानी प्रमुख है, प्रचलित जनश्रुतियों में किसी में रत्नावती को भानगढ़ की रानी बताया गया है तो किसी कहानी में भानगढ़ की सुन्दर राजकुमारी| पर दोनों ही कथाओं में इस पात्र के साथ सिंधु सेवड़ा नामक तांत्रिक का नाम व उसका कुकृत्य जरुर जुड़ा है| प्रचलित कहानी के अनुसार सिंधु देवड़ा महल के पास स्थित पहाड़ पर तांत्रिक क्रियाएँ करता था वह रानी रत्नावती के रूप पर आसक्त था| एक दिन भानगढ़ के बाजार में उसने देखा कि रानी कि एक दासी रानी के लिए केश तेल लेने आई है सिंधु सेवड़ा ने उस तेल को अभिमंत्रित कर दिया कि वह तेल जिस किसी पर लगेगा उसे वह तेल उसके पास ले आएगा|
कहते है रानी ने जब तेल को देखा तो वह समझ गई कि यह तेल सिंधु सेवड़ा द्वारा अभिमंत्रित है कहते है रानी भी बहुत सिद्ध थी इसलिए उसने पहचान करली और दासी से उस तेल को तुरंत फैंकने को कहा| दासी ने उस तेल को एक चट्टान पर गिरा दिया| कहते है अभिमंत्रित तेल ने चट्टान को उडाकर सिंधु सेवड़ा की और रवाना कर दिया सिंधु सेवड़ा ने चट्टान देखकर अनुमान लगाया कि रानी उस पर बैठकर उसके पास आ रही सो उसने अभिमंत्रित तेल को रानी को सीधे अपनी छाती पर उतारने का आदेश दिया|

जब चट्टान पास आई तब तांत्रिक को असलियत पता चली तो उसने आनन् फानन में चट्टान उसके ऊपर गिरने से पहले भानगढ़ नगर उजड़ने का शाप दे दिया और खुद चट्टान के नीचे दबकर मर गया| कहते है सिद्ध रानी को यह सब समझते देर ना लगी और उसने तुरंत नगर खाली कराने का आदेश दे दिया| इस तरह यह नगर खाली होकर उजड़ गया और रानी भी तांत्रिक के शाप की भेंट चढ गई|https://vijayrampatrika.wordpress.com/?s=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2

कहानी में सचाई
इस कहानी में कितनी सच्चाई है इसके बारे में इस बात से ही जाना जा सकता है कि जनश्रुतियों में भानगढ़ के लिए प्रचलित कहानी में कई लोग रत्नावती को राजकुमारी तो कई लोग रानी बतातें है|

>> रत्नावती का जिक्र तो हर कोई करता है पर वह किस राजा की रानी थी ?
>> उसके राजा व उसका शासन काल कौनसा था?
>> नगर किस काल में उजड़ा?
इस प्रश्नों पर सब चुप है| अक्सर लोग इस नगर व किले को ५०० वर्ष पहले उजड़ा बताते है पर किले से मिले विभिन्न राजाओं के शिलालेखों की तारीख देखने के बाद उसके उजड़ने की समय सीमा काफी कम हो जाती है| हमने अपनी यात्रा में एक मंदिर (शायद मंगला देवी या केशवराय) के गर्भगृह के द्वार पर लगी एक बड़ी शिला पर संवत १९०२ लिखा देखा इस हिसाब से उस मंदिर के निर्माण का काल संवत १९०२ है तो जाहिर है आज से १६७ वर्ष पुर्व यह नगर आबाद था|

ये कहता है इतिहास तोः
अपने पास उपलब्ध इतिहास की पुस्तकों में हमें भानगढ़ के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं मिली पर कुंवर देवीसिंह मंडावा की पुस्तक “राजस्थान के कछवाह” में भानगढ़ के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी जरुर है।  अब तक हमें मिली भानगढ़ के किले की ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर भानगढ़ का किला जो आमेर के राजा भगवंतदास ने बनाया था उनके छोटे बेटे माधवसिंह (माधोसिंह) को मिला।  भगवंतदास का स्वर्गवास मंगसर सुदी ७ वि.स. १६४६, १५ दिसम्बर १५९० को लाहौर में हुआ था| इसलिए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि इस समय के आस-पास इस किले की राजगद्दी पर माधवसिंह बैठे थे।  इनके अधीन मालपुरा भी था व मुंहता नैणसी के अनुसार अजमेर भी था।

माधवसिंह (माधोसिंह) अपने बड़े भाई आमेर के राजा मानसिंह की भांति ही बहुत वीर पुरुष थे उन्होंने शाही सेना में रहते हुए कई महत्वपूर्ण युद्धों में वीरता दिखाकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था| आमेर में इनकी वीरता के बहुत किस्से प्रचलित थे| एक बार वे आमेर आये थे कि आमेर किले के एक झरोखे से अचानक गिरने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई| जहाँ उनकी मृत्यु हुई वहां उनका एक स्मारक भी बना है| राजस्थान के इतिहासकार ओझा जी को भानगढ़ में माधवसिंह के दो शिलालेख मिले थे जिन पर माघ बदी एकम वि.स. १६५४ और दूसरे में १६५५ लिखा था|

https://vijayrampatrika.wordpress.com/?s=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2माधवसिंह (माधोसिंह) के बाद उनका पुत्र छत्रसाल जिसे छत्रसिंह के नाम से भी जाना जाता है भानगढ़ की गद्दी पर बैठा| छत्रसिंह अपने दो पुत्रों भीमसिंह व आनंद सिंह के साथ दक्षिण में शाही सेना से बगावत करने वाले खानजहाँ लोदी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे| छत्रसिंह का एक पुत्र अजबसिंह भी था जिसने भानगढ़ के पास ही अजबगढ़ नाम से एक नगर बसाया और वहां किला बनवाया| अजबसिंह ने बलख युद्ध में अप्रत्याशित वीरता दिखाई थी| छत्रसिंह का भानगढ़ में मिले एक शिलालेख में आषाढ़ बदी १३ वि.स.१६७६ अंकित मिला है| छत्रसिंह का एक पुत्र उग्रसेन भी था पर गद्दी पर कौन बैठा उसका पता मेरे पास उपलब्ध पुस्तकों में नहीं मिला| पर भानगढ़ में मिले एक अन्य शिलालेख में माघ बदी एकम वि.स.१७२२ में इसी वंश का एक वंशज हरिसिंह गद्दी पर बैठा|

हरिसिंह के दो बेटे या उसके वंश के दो बेटे औरंगजेब के काल में मुसलमान बन गए थे जिनका नाम मोहम्मद कुलीज व मोहम्मद दहलीज था जिन्हें भानगढ़ राज्य मिला था इन दोनों भाइयों का एक शिलालेख भानगढ़ में मिला है जिस पर जेठ सुदी १४ १७५६ अंकित है| इन दोनों भाइयों के मुसलमान बनने व दिल्ली में मुग़ल सत्ता के कमजोर होने का फायदा उठाते हुए आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इन दोनों भाइयों को मारकर भानगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था और इस राज्य को अपने अधीन कर माधवसिंह(माधोसिंह) के ही वंशजों को अपने अधीन जागीरदार बना दिया|

अनुत्तरित सवाल
>> महाराजा सवाई जयसिंह जी द्वारा अपने अधीन करने के बाद इस किले का कौन कौन जागीरदार रहा?
>> किले का प्रबंध व नियंत्रण किस जागीरदार के हाथों में रहा?
>> रत्नावती जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पास के ही एक गांव तीतरवाडा की रहने वाली थी किस जागीरदार की रानी थी?
>> नगर कब और क्यों उजड़ा?
>> ऐसी कौनसी परिस्थितयां रही होगी कि जयपुर आमेर के शक्तिशाली शासकों के अधीन रहते हुए यह संपन्न और समृद्ध नगर वीरान हो उजड़ गया!
>> पुरा शहर और महल उजड़ गया सभी निर्माण जमींदोज हुए पर वहां बने मंदिर सुरक्षित कैसे रहे ?
ऐसे कई प्रश्न है जिनके निवारण के लिए शोध की आवश्यकता है| एक समय समृद्ध रहे भानगढ़ नगर के इतिहास को आप इस तरह समझ सकते हैं-

https://vijayrampatrika.wordpress.com/?s=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%A2भूतों का सच
इस किले व नगर के उजड़ने के संबंध प्रचलित कहानियों व जन-श्रुतियों की ऊपर चर्चा की जा चुकी है पर किले व नगर को देखने के बाद आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किले व नगर का नाश किसी चट्टान द्वारा नहीं किया गया है बल्कि नगर उजड़ जाने व खाली हो जाने के कई वर्षों बाद तक आस-पास के ग्रामीणों व अन्य लोगों द्वारा खाली पड़ी इमारतों से जरुरत का सामान निकालने के चक्कर में इमारतें खंडहर में तब्दील हुई है वही किले व महलों को उनमें गड़े धन को निकालने के लिए चोरों द्वारा खुदाई करने के चलते नुक्सान पहुंचा है साथ ही पर्यटकों द्वारा भी नगर व महल की टूटी दीवारों पर चढ़ने के कारण नुकसान पहुंचा है|

सुरक्षित गोपीनाथ मंदिर
मजे की बात यह है कि नगर में बनी हवेलियाँ व बाजार में बनी दुकानें खंडहर में तब्दील हो गई पर भानगढ़ नगर में बने प्राचीन मंदिर वैसे के वैसे सुरक्षित है हाँ उनकी मूर्तियां जरुर गायब है| यदि प्राकृतिक विपदा या तांत्रिक द्वारा अपनी शक्ति से नगर का उजड़ना माना जाय तो फिर मंदिर कैसे बच गए? बात साफ है एक तो मंदिरों में लगे दरवाजे आदि घरों में इस्तेमाल लायक नहीं फिर लोग मंदिरों का देवताओं के डर से नुक्सान पहुँचाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

किले व उजड़े नगर में भूतों की बात की सच्चाई जानने के लिए आपको बता दें कि कुछ मीडियाज टीम ने पैरानार्मल उपकरणों व कैमरों के साथ पुरी रात किले में भ्रमण कर गुजारी उन्हें न तो कोई भूत ही मिला न उनके उपकरणों ने कोई ऐसी बात दर्ज की कि जिसके सहारे वहां भूत होने की पुष्टि हो|

पुरातत्व विभाग के कर्मचारी से भूतों के अस्तित्व पर कर्मचारी के मुताबिक कि वहां कुल नौ कर्मचारी ऐसे है जिन्हें तीन तीन की टोली में तीन शिफ्टों में किला परिसर की सुरक्षा में तैनात रहना पड़ता है और रात्री गश्त भी वे करते है| रात्री गश्त करते समय उन्होंने कभी वहां भूत होने का अहसास नहीं हुआ और न ही उन्हें कभी डर लगा हाँ जंगल होने की वजह से जंगली जानवरों का डर जरुर है जिसके लिए उन्हें सतर्क व चौकन्ना रहना पड़ता है|

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